Shayari

Mirza Galib Sher: "इश्क़ और रस्म-रिवाज" पर कहे गये कुछ चुनिंदा शेर

Md Parvej Ansari

20 October 2023

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

ख़्वाहिश  शायरी

यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं, अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इम्तहाँ शायरी

उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक, वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

रौनक शायरी

तुम न आए तो क्या सहर न हुई हाँ मगर चैन से बसर न हुई मेरा नाला सुना ज़माने ने एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई 

खबर  शायरी

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है, वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता ! 

याद शायरी

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है 

रश्क शायरी

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है 

जुस्तजू शायरी

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