
- प्रॉपर्टी रजिस्ट्री का कुल खर्च मुख्य रूप से स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस पर निर्भर करता है।
- भारत के अलग-अलग राज्यों में स्टाम्प ड्यूटी की दरें लगभग 3% से 8% के बीच बदलती रहती हैं।
- ज्यादातर राज्यों में महिलाओं के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदने पर स्टाम्प ड्यूटी में 1% से 2% तक की छूट मिलती है।
- प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री हमेशा सर्किल रेट या मार्केट रेट में से जो भी अधिक हो, उस मूल्य पर की जाती है।
- रजिस्ट्री के बाद ‘दाखिल-खारिज’ (Mutation) कराना कानूनी मालिकाना हक पाने के लिए बेहद जरूरी है।
जब आप अपना सपनों का घर, फ्लैट या जमीन खरीदने जाते हैं, तो केवल प्रॉपर्टी की कीमत चुकाना ही काफी नहीं होता। इसके बाद एक बहुत बड़ा और जरूरी खर्च आता है, जिसे हम प्रॉपर्टी रजिस्ट्री का खर्च कहते हैं। कई बार लोग बजट बनाते समय इस खर्च को जोड़ना भूल जाते हैं और बाद में उन्हें अचानक लाखों रुपये का इंतजाम करना पड़ता है। भारत में किसी भी अचल संपत्ति (Immovable Property) को कानूनी रूप से अपने नाम कराने के लिए स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस देना अनिवार्य है। अगर आप भी कोई प्रॉपर्टी खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो आपको इस पूरे सरकारी और गैर-सरकारी खर्च का गणित अच्छी तरह समझ लेना चाहिए ताकि आपका बजट न बिगड़े।
प्रॉपर्टी रजिस्ट्री क्या है और यह क्यों ज़रूरी है?
प्रॉपर्टी रजिस्ट्री वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी संपत्ति का मालिकाना हक एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के नाम पर ट्रांसफर किया जाता है। भारतीय पंजीकरण अधिनियम, 1908 (Registration Act, 1908) के तहत ₹100 से अधिक मूल्य की किसी भी अचल संपत्ति की रजिस्ट्री कराना कानूनन अनिवार्य है। जब तक आप सरकारी दस्तावेजों में रजिस्ट्री नहीं कराते, तब तक आप उस प्रॉपर्टी के कानूनी मालिक नहीं माने जाते हैं, भले ही आपने विक्रेता को पूरा पैसा क्यों न दे दिया हो।
रजिस्ट्री की प्रक्रिया स्थानीय सब-रजिस्ट्रार ऑफिस (SRO) में पूरी की जाती है। यहाँ खरीदार, विक्रेता और दो गवाहों की मौजूदगी में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और बायोमेट्रिक (अंगूठे के निशान और फोटो) लिए जाते हैं। यह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो जाता है कि अब इस प्रॉपर्टी के मालिक आप हैं। भविष्य में किसी भी तरह के कानूनी विवाद, धोखाधड़ी या जमीन पर अवैध कब्जे से बचने के लिए रजिस्ट्री ही आपका सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होती है।
इसके अलावा, अगर आप अपनी प्रॉपर्टी पर बैंक से होम लोन (Home Loan) लेना चाहते हैं, तो बैंक सबसे पहले रजिस्ट्री के कागजात ही मांगता है। बिना रजिस्टर्ड डीड के कोई भी सरकारी या प्राइवेट बैंक आपको लोन नहीं देगा। इसलिए, रजिस्ट्री केवल एक टैक्स या सरकारी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह आपकी गाढ़ी कमाई से खरीदी गई संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी है।
स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस का पूरा गणित
रजिस्ट्री के दौरान होने वाले खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा स्टाम्प ड्यूटी (Stamp Duty) और रजिस्ट्रेशन फीस (Registration Fee) का होता है। स्टाम्प ड्यूटी एक प्रकार का सरकारी टैक्स है जो राज्य सरकारों द्वारा वसूला जाता है। चूंकि यह राज्य सरकार का विषय है, इसलिए हर राज्य में इसकी दरें अलग-अलग होती हैं। आमतौर पर यह प्रॉपर्टी के कुल मूल्य का लगभग 3% से 8% तक होती है।
दूसरी तरफ, रजिस्ट्रेशन फीस वह चार्ज है जो सरकार आपके दस्तावेजों को अपने रिकॉर्ड में दर्ज करने के लिए लेती है। ज्यादातर राज्यों में यह फीस प्रॉपर्टी की वैल्यू का फ्लैट 1% होती है, लेकिन कुछ राज्यों में इसके लिए एक अधिकतम सीमा (जैसे अधिकतम ₹10,000 से ₹20,000 या ₹50,000) भी तय की गई है। इन दोनों शुल्कों को मिलाकर ही रजिस्ट्री का मुख्य खर्च तय होता है।
नीचे दी गई तालिका में भारत के कुछ प्रमुख राज्यों में लगने वाली स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस की एक अनुमानित रेंज दी गई है। ध्यान रखें कि ये दरें समय-समय पर बदलती रहती हैं, इसलिए सटीक और ताजा दरों के लिए संबंधित राज्य के राजस्व विभाग की आधिकारिक वेबसाइट (जैसे IGRSUP, Bhulekh आदि) पर जरूर जाएं।
| राज्य का नाम | पुरुषों के लिए स्टाम्प ड्यूटी (अनुमानित) | महिलाओं के लिए स्टाम्प ड्यूटी (अनुमानित) | रजिस्ट्रेशन फीस (अनुमानित) |
|---|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश (UP) | 7% | 6% (₹10 लाख तक की छूट) | 1% (अधिकतम ₹20,000) |
| बिहार | 6% | 5.7% | 2% |
| मध्य प्रदेश (MP) | 7.5% | 7.5% | 3% |
| महाराष्ट्र | 5% से 7% (शहर के अनुसार) | 4% से 6% | 1% (अधिकतम ₹30,000) |
| राजस्थान | 6% | 5% | 1% (अधिकतम ₹1 लाख) |
| झारखंड | 4% | 4% | 3% |
सर्किल रेट और मार्केट रेट का अंतर: रजिस्ट्री किस पर होती है?
प्रॉपर्टी खरीदते समय आपके सामने दो तरह के रेट आते हैं – सर्किल रेट (Circle Rate) और मार्केट रेट (Market Rate)। सर्किल रेट वह न्यूनतम मूल्य है जो स्थानीय प्रशासन या जिला कलेक्टर द्वारा किसी क्षेत्र की जमीन या प्रॉपर्टी के लिए तय किया जाता है। इससे कम कीमत पर उस इलाके में किसी भी प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री नहीं की जा सकती। अलग-अलग राज्यों में इसे रेडी रेकनर रेट (Ready Reckoner Rate) या गाइडलाइन वैल्यू भी कहा जाता है।
मार्केट रेट वह असल कीमत होती है जिस पर खरीदार और विक्रेता के बीच सौदा तय होता है। यह अक्सर सर्किल रेट से ज्यादा होती है क्योंकि यह बाजार की मांग, प्राइम लोकेशन, कनेक्टिविटी और सुविधाओं पर निर्भर करती है। रजिस्ट्री का नियम बहुत साफ है: स्टाम्प ड्यूटी की गणना हमेशा सर्किल रेट या वास्तविक खरीद मूल्य (मार्केट रेट) में से जो भी अधिक हो, उस पर की जाती है।
उदाहरण के लिए, अगर किसी जमीन का सर्किल रेट के हिसाब से मूल्य ₹20 लाख बनता है, लेकिन आपने उसे ₹25 लाख में खरीदा है, तो आपको ₹25 लाख पर स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी। वहीं अगर आपने वह प्रॉपर्टी ₹18 लाख में ही खरीद ली, तब भी सरकार आपसे न्यूनतम ₹20 लाख के सर्किल रेट पर ही स्टाम्प ड्यूटी वसूलेगी। इसलिए जमीन खरीदने से पहले स्थानीय स्तर पर जमीन की नापी और उसके सही सरकारी मूल्य को समझ लेना चाहिए। यदि आप झारखंड या बिहार जैसे राज्यों में जमीन खरीद रहे हैं, तो आपको कट्ठा/डिसमिल/बीघा का हिसाब अच्छी तरह समझ लेना चाहिए ताकि रजिस्ट्री के समय क्षेत्रफल को लेकर कोई उलझन न हो।
रजिस्ट्री के समय लगने वाले अन्य हिडन चार्ज (Hidden Charges)
अक्सर लोग केवल स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस को ही अपना एकमात्र खर्च मान लेते हैं, लेकिन हकीकत में रजिस्ट्री ऑफिस के चक्कर काटते समय कई छोटे-बड़े हिडन चार्ज भी सामने आते हैं। इन खर्चों को भी अपने बजट में शामिल करना बहुत जरूरी है ताकि ऐन वक्त पर पैसों की कमी न पड़े।
- वकील या डीड राइटर की फीस: रजिस्ट्री का कानूनी दस्तावेज (Sale Deed) तैयार करने के लिए आपको किसी पेशेवर वकील या अधिकृत डीड राइटर (Deed Writer) की मदद लेनी होती है। इनकी फीस प्रॉपर्टी के आकार और जटिलता के आधार पर ₹5,000 से ₹25,000 तक हो सकती है।
- कंप्यूटरीकरण और स्कैनिंग शुल्क: आजकल लगभग सभी राज्यों में रजिस्ट्री की प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई है। इसके लिए सरकार ₹500 से ₹3,000 तक का स्कैनिंग और कंप्यूटर सर्विस चार्ज लेती है।
- गवाहों और नोटरी का खर्च: रजिस्ट्री के समय दो गवाहों की जरूरत होती है। उनके दस्तावेजों को सत्यापित कराने और एफिडेविट (हलफनामा) बनवाने में ₹1,000 से ₹3,000 का खर्च आ सकता है।
- नक्शा और लेआउट चार्ज: अगर आप किसी बने-बनाए मकान या बिल्डिंग की रजिस्ट्री करा रहे हैं, तो उसका स्वीकृत नक्शा भी साथ लगाना पड़ता है। यदि आप खुद का घर बनाने जा रहे हैं, तो रजिस्ट्री के बाद आपको नक्शा पास प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें सरकारी फीस और आर्किटेक्ट का खर्च शामिल होता है।
महिलाओं और सीनियर सिटीजन के लिए विशेष छूट
भारत सरकार और विभिन्न राज्यों की सरकारें महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने और महिलाओं को संपत्ति का मालिक बनाने के लिए रजिस्ट्री शुल्क में विशेष छूट देती हैं। अगर प्रॉपर्टी किसी महिला के नाम पर खरीदी जा रही है, या वह प्रॉपर्टी में मुख्य सह-आवेदक (Co-owner) है, तो स्टाम्प ड्यूटी में सीधे तौर पर 1% से 2% तक की बड़ी बचत की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए स्टाम्प ड्यूटी की दरें पुरुषों की तुलना में कम हैं। यदि आप ₹50 लाख की प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं और वहां महिलाओं के लिए 1% की छूट है, तो आप सीधे ₹50,000 बचा सकते हैं। इसलिए, कई परिवार टैक्स बचाने और महिला के नाम पर संपत्ति सुरक्षित करने के लिए घर की महिलाओं के नाम पर ही रजिस्ट्री कराना पसंद करते हैं।
इसके अलावा, कुछ राज्य सीनियर सिटीजन (वरिष्ठ नागरिकों) को भी रजिस्ट्री शुल्कों में मामूली राहत या रियायत देते हैं। हालांकि, यह नियम हर राज्य में लागू नहीं है। रजिस्ट्री कराने से पहले आपको अपने राज्य के स्थानीय नियमों की जांच कर लेनी चाहिए कि क्या आपके परिवार के किसी सदस्य के नाम पर रजिस्ट्री कराने से कोई अतिरिक्त छूट मिल सकती है या नहीं।
प्रॉपर्टी रजिस्ट्री की पूरी प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री कराना एक बेहद महत्वपूर्ण और कानूनी प्रक्रिया है। इसे सही तरीके से पूरा करने के लिए आपको नीचे दिए गए स्टेप्स का पालन करना चाहिए:
स्टेप 1: प्रॉपर्टी का वेरिफिकेशन और टाइटल सर्च
रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू करने से पहले प्रॉपर्टी के पुराने कागजात (Chain Deeds) की जांच करें। यह सुनिश्चित करें कि विक्रेता ही जमीन का असली मालिक है और उस पर कोई पुराना लोन या कानूनी विवाद नहीं चल रहा है।
स्टेप 2: सर्किल रेट का पता लगाना और वैल्यूएशन
उस इलाके के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस या राज्य की राजस्व वेबसाइट पर जाकर अपनी प्रॉपर्टी का सटीक सर्किल रेट निकालें। इसी रेट के आधार पर तय करें कि आपको कितनी स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी।
स्टेप 3: सेल डीड (Sale Deed) का ड्राफ्ट तैयार करना
किसी अच्छे वकील से सेल डीड (बिक्री नामा) तैयार करवाएं। इसमें खरीदार, विक्रेता, प्रॉपर्टी का पूरा विवरण, चौहद्दी (दिशाएं), और भुगतान की गई राशि का स्पष्ट जिक्र होना चाहिए।
स्टेप 4: स्टाम्प पेपर खरीदना और अपॉइंटमेंट लेना
तय की गई स्टाम्प ड्यूटी के बराबर मूल्य के ई-स्टाम्प पेपर खरीदें। इसके बाद, राज्य के ऑनलाइन रजिस्ट्री पोर्टल पर जाकर सब-रजिस्ट्रार ऑफिस (SRO) में फिजिकल वेरिफिकेशन के लिए अपॉइंटमेंट बुक करें।
स्टेप 5: रजिस्ट्री ऑफिस जाना और प्रक्रिया पूरी करना
तय समय पर खरीदार, विक्रेता और दो गवाहों के साथ ओरिजिनल पहचान पत्र (PAN Card, Aadhaar Card) लेकर SRO ऑफिस पहुंचें। वहां दस्तावेजों की जांच होगी, बायोमेट्रिक लिया जाएगा और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी होगी। इसके कुछ दिनों बाद आपको रजिस्टर्ड डीड की कॉपी मिल जाएगी।
| चरण (Step) | मुख्य गतिविधि | जरूरी दस्तावेज | अनुमानित समय |
|---|---|---|---|
| चरण 1 | टाइटल सर्च और डीड ड्राफ्टिंग | पुरानी डीड, अलॉटमेंट लेटर | 2 से 4 दिन |
| चरण 2 | ऑनलाइन फीस भुगतान और स्लॉट बुकिंग | PAN, आधार, सर्किल रेट कैलकुलेशन शीट | 1 से 2 दिन |
| चरण 3 | SRO ऑफिस में बायोमेट्रिक और हस्ताक्षर | सभी ओरिजिनल दस्तावेज, गवाहों के ID | 1 दिन (3-4 घंटे) |
| चरण 4 | ओरिजिनल रजिस्ट्री डीड प्राप्त करना | रसीद (Receipt) | 3 से 7 दिन |
रजिस्ट्री कराते समय लोग अक्सर क्या गलतियाँ करते हैं?
प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री के दौरान की गई एक छोटी सी गलती भी आपके लिए भविष्य में भारी कानूनी मुसीबत खड़ी कर सकती है। लोग अक्सर जल्दबाजी में या पैसों की बचत के चक्कर में कुछ ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जिससे उनकी रजिस्ट्री अमान्य या विवादित हो सकती है।
- अंडर-वैल्यूएशन (Under-valuation) करना: कुछ लोग स्टाम्प ड्यूटी बचाने के लिए प्रॉपर्टी की कीमत को सर्किल रेट से भी कम दिखाते हैं। यह एक गंभीर कानूनी अपराध है। पकड़े जाने पर भारी जुर्माना और जेल की सजा भी हो सकती है। हमेशा वास्तविक मूल्य या सर्किल रेट पर ही रजिस्ट्री कराएं।
- नाम और पते की स्पेलिंग में गलती: सेल डीड तैयार करते समय खरीदार, विक्रेता या गवाहों के नाम और पते की स्पेलिंग में थोड़ी सी भी गलती (Typographical Error) नहीं होनी चाहिए। अगर आधार कार्ड में नाम अलग है और डीड में अलग, तो आगे चलकर म्यूटेशन या लोन लेने में बहुत परेशानी होगी। ऐसी ही गलतियों से बचने के लिए लोग घर बनाते समय 15 गलतियाँ जैसी गाइड पढ़ते हैं ताकि वे निर्माण और कागजी कार्रवाई दोनों में सुरक्षित रहें।
- पुराने बकाये की जांच न करना: फ्लैट या मकान खरीदते समय लोग यह देखना भूल जाते हैं कि उस पर कोई पुराना बिजली बिल, पानी का बिल, या प्रॉपर्टी टैक्स बकाया तो नहीं है। रजिस्ट्री होने के बाद इन सभी बकायों को चुकाने की जिम्मेदारी नए मालिक यानी आपकी हो जाती है।
- गवाहों का सही चुनाव न करना: रजिस्ट्री के समय ऐसे लोगों को गवाह बनाएं जो भरोसेमंद हों और जरूरत पड़ने पर कोर्ट या सरकारी दफ्तर में आकर आपके पक्ष में गवाही दे सकें। किसी भी अनजान व्यक्ति को रजिस्ट्री ऑफिस के बाहर से पकड़कर गवाह बनाने से बचें।
रजिस्ट्री के बाद क्या करें? म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) का महत्व
कई लोग सोचते हैं कि सब-रजिस्ट्रार ऑफिस से रजिस्ट्री के कागजात मिल जाने के बाद उनका काम पूरा हो गया। लेकिन यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। रजिस्ट्री केवल इस बात का सबूत है कि आपने प्रॉपर्टी खरीदी है। लेकिन सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आपको ‘म्यूटेशन’ (Mutation) यानी दाखिल-खारिज कराना बेहद जरूरी है।
दाखिल-खारिज की प्रक्रिया स्थानीय नगर निगम, नगर पालिका या अंचल कार्यालय (Tehsil Office) में होती है। इसके तहत सरकारी रजिस्टर से पुराने मालिक का नाम काटकर आपका नाम चढ़ा दिया जाता है। जब तक दाखिल-खारिज नहीं होता, तब तक उस प्रॉपर्टी का सरकारी टैक्स बिल पुराने मालिक के नाम पर ही आता रहेगा और तकनीकी रूप से सरकार की नजर में जमीन का ट्रांसफर अधूरा माना जाएगा।
एक बार जब रजिस्ट्री और दाखिल-खारिज दोनों काम सफलतापूर्वक पूरे हो जाएं, तब जाकर आप अपनी प्रॉपर्टी के पूर्ण और निर्विवाद मालिक बनते हैं। इसके बाद आप खुशी-खुशी अपने नए आशियाने में प्रवेश की तैयारी कर सकते हैं। गृह प्रवेश से जुड़ी सभी धार्मिक और व्यावहारिक तैयारियों के लिए आप हमारी गृह प्रवेश चेकलिस्ट की मदद ले सकते हैं, ताकि आपके नए जीवन की शुरुआत बेहद शुभ और व्यवस्थित तरीके से हो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: क्या स्टाम्प ड्यूटी का पैसा होम लोन में शामिल होता है?
जवाब: ज्यादातर बैंक होम लोन स्वीकृत करते समय केवल प्रॉपर्टी की मार्केट वैल्यू (Agreement Value) का ही 75% से 90% तक लोन देते हैं। स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस का खर्च आमतौर पर खरीदार को अपनी जेब (Own Contribution) से ही देना पड़ता है। हालांकि, कुछ बैंक विशेष मामलों में इसे लोन राशि में शामिल कर सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम होती है।
सवाल 2: क्या ई-स्टाम्पिंग (E-stamping) सुरक्षित है?
जवाब: हाँ, ई-स्टाम्पिंग पूरी तरह से सुरक्षित और विश्वसनीय है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने फिजिकल स्टाम्प पेपर की कालाबाजारी और धोखाधड़ी को रोकने के लिए इसे अनिवार्य किया है। आप स्टॉक होल्डिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SHCIL) की वेबसाइट या अधिकृत बैंकों से आसानी से ई-स्टाम्प खरीद सकते हैं।
सवाल 3: क्या रजिस्ट्री के बाद सेल डीड खो जाने पर दोबारा मालिकाना हक मिल सकता है?
जवाब: अगर आपकी ओरिजिनल सेल डीड खो जाती है, तो आपको तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करानी चाहिए और अखबार में विज्ञापन देना चाहिए। इसके बाद, आप सब-रजिस्ट्रार ऑफिस (SRO) में आवेदन देकर अपनी रजिस्ट्री डीड की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) प्राप्त कर सकते हैं, जो कानूनी रूप से मान्य होती है।
सवाल 4: पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) और रजिस्ट्री में क्या अंतर है?
जवाब: जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) केवल किसी व्यक्ति को प्रॉपर्टी की देखभाल या प्रबंधन करने का अधिकार देती है, यह मालिकाना हक का ट्रांसफर नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, GPA के जरिए प्रॉपर्टी बेचना या खरीदना गैर-कानूनी है। पूर्ण मालिकाना हक केवल रजिस्टर्ड सेल डीड (रजिस्ट्री) के माध्यम से ही मिलता है।
सवाल 5: दाखिल-खारिज (Mutation) कराने में कितना समय लगता है?
जवाब: रजिस्ट्री होने के बाद दाखिल-खारिज के लिए आवेदन किया जाता है। आमतौर पर इस प्रक्रिया में 30 से 90 दिनों का समय लगता है। इस दौरान राजस्व विभाग एक सार्वजनिक नोटिस जारी करता है ताकि अगर किसी को इस ट्रांसफर पर आपत्ति हो, तो वह दर्ज करा सके। कोई आपत्ति न होने पर म्यूटेशन दर्ज कर लिया जाता है।
सवाल 6: क्या गिफ्ट डीड (Gift Deed) पर भी स्टाम्प ड्यूटी लगती है?
जवाब: हाँ, गिफ्ट डीड पर भी स्टाम्प ड्यूटी लगती है। हालांकि, कई राज्यों में अगर प्रॉपर्टी परिवार के किसी करीबी सदस्य (जैसे माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे या भाई-बहन) को गिफ्ट की जा रही है, तो स्टाम्प ड्यूटी की दरें सामान्य सेल डीड के मुकाबले काफी कम (लगभग 1% से 2% या एक निश्चित मामूली शुल्क) होती हैं।
सवाल 7: क्या रजिस्ट्री शुल्क ऑनलाइन जमा किया जा सकता है?
जवाब: हाँ, आज के समय में लगभग सभी राज्यों में रजिस्ट्री शुल्क, स्टाम्प ड्यूटी और कोर्ट फीस का भुगतान ऑनलाइन नेट बैंकिंग, डेबिट/क्रेडिट कार्ड या UPI के माध्यम से किया जा सकता है। भुगतान करने के बाद मिलने वाले ई-चालान या रसीद को रजिस्ट्री के समय SRO ऑफिस में दिखाना अनिवार्य होता है।
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