
कबीर गरब न कीजिए, ऊँचा देखि आवास। काल
ही पर्टोट लेटना, ऊपर जासी घास।
— कबीर दास
भक्तिकाल के महान संत कबीर दास की यह प्रसिद्ध पंक्ति मनुष्य को उसकी वास्तविक औकात और जीवन की नश्वरता का आईना दिखाती है। कबीर कहते हैं कि ऊंचे-ऊंचे आलीशान मकान देखकर कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक दिन इस शरीर को यहीं मिट्टी में लेटना है और इसके ऊपर घास उग जाएगी। कबीर का मिजाज हमेशा से बागी, बेबाक और यथार्थवादी रहा है। वे समाज के पाखंड, दिखावे और झूठे अहंकार पर तीखा प्रहार करते थे। उनकी यह वाणी किसी भी प्रकार के भौतिक मोह और राजा-रंक के भेद को खारिज करती है। वे मानते हैं कि मौत अकाट्य सत्य है और धन-दौलत का घमंड बिल्कुल व्यर्थ है।
आज के भौतिकवादी और उपभोगवादी दौर में इस पंक्ति की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। आज इंसान बड़े-बड़े बंगले, गाड़ियां और अथाह संपत्ति जुटाने की अंधी दौड़ में शामिल है और इसी झूठी शान-शौकत में वह दूसरों को नीचा दिखाने से भी नहीं चूकता। कबीर का यह दोहा हमें जमीन से जुड़े रहने की सीख देता है। यह याद दिलाता है कि अंत में सब कुछ यहीं छूट जाना है, इसलिए अहंकार छोड़कर सादगी और मानवता को अपनाना ही जीवन का असली सार है।
कबीर दास की चुनी हुई पंक्तियाँ
कबीर दास के बारे में
कबीर दास 15वीं सदी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उन्होंने अपनी साखियों और पदों के माध्यम से समाज में फैली कुप्रथाओं, पाखंडों और बाह्य आडंबरों पर करारा प्रहार किया। वे निर्गुण ब्रह्म के उपासक और मानव एकता के प्रबल समर्थक थे। पूरा परिचय और सभी विचार: कबीर दास — लेखक कोश।
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