
सचहु ओरे सभु को उपरि सचु आचारु। (सत्य ही सर्वोच्च
है, किंतु सच्चा आचरण सत्य से भी ऊपर है।)[सच्चाई]
— गुरु नानक
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की यह कालजयी पंक्ति “सचहु ओरे सभु को उपरि सचु आचारु” मानव जीवन के सबसे व्यावहारिक दर्शन को प्रकट करती है। इसका सीधा
गुरु नानक की चुनी हुई पंक्तियाँ
नानक दुखीआ सबु संसारु, मानै हुकमु सोई दरवारु।
जेतते जिय तितते तेरी नाई, विणु नावै नाही को जाइ।
लख नेकी आचार लख सीतापार लख ग्यान, लख पूजा लख तप मनि आचारु न पावै मानु।
हउमै विचि जगु उपजै माई, दूजै भाइ छटु खुआई।
जे मो मोहू जिणै मन, ता पावै दरगह मान।
आपसु को जे भला कहावै, तिन तउ कूड़ु न कोई पावै।
सो क्यो मंदा आखीऐ जितु जम्हि राजान। (उस नारी को बुरा क्यों कहें, जो राजाओं और महान पुरुषों को जन्म देती है।)[समाज-न्याय]
गुरु नानक के बारे में
गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु थे। उनका जन्म 1469 में तलवंडी में हुआ और 1539 में करतारपुर में उनका ज्योति جوत समाना हुआ। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को दूर कर ईश्वर की एकता पर बल दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: गुरु नानक — लेखक कोश।
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