
तजै मन की मान बड़ाई, जौं पै हरि प्रगटैं
इन नैंननि, तब जानौं चतुराई।
— सूरदास
महाकवि सूरदास की यह प्रसिद्ध पंक्ति मनुष्य के अंहकार और उसकी कथित बुद्धिमत्ता पर करारा व्यंग्य करती है। इसमें कवि कहते हैं कि व्यक्ति को अपने मन का मान-सम्मान और बढ़ाई का अहंकार त्याग देना चाहिए। लोग अक्सर अपनी चतुराई और ज्ञान का बहुत अभिमान करते हैं, लेकिन सूरदास जी चुनौती देते हैं कि असली चतुराई तो तब मानी जाएगी जब भगवान खुद साक्षात इन आँखों के सामने प्रकट हो जाएं। इस पंक्ति में सूरदास का मिजाज पूरी तरह से एक अनन्य भक्त और संत का है, जो सांसारिक दिखावे, झूठे अहंकार और बौद्धिक गर्व को पूरी तरह खारिज करता है। उनका दृष्टिकोण भगवान की कृपा और प्रत्यक्ष दर्शन को ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है, जहाँ मनुष्य की सारी चालाकियां और ज्ञान धरे के धरे रह जाते हैं।
आज के आधुनिक और भौतिकवादी संदर्भ में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आज का इंसान सोशल मीडिया की लोकप्रियता, धन और अपनी झूठी शान-शौकत (बढ़ाई) के पीछे अंधाधुंध भाग रहा है और खुद को बहुत चालाक समझता है। ऐसे दौर में सूरदास का यह संदेश हमें यह याद दिलाता है कि हमारी सारी डिग्रियां, योग्यताएं और अंहकार तब तक व्यर्थ हैं जब तक हमारे भीतर करुणा, विनम्रता और सच्चाई का वास नहीं होता। आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने ‘मैं’ यानी अहंकार का त्याग करें और दिखावे की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन के वास्तविक मूल्यों और आंतरिक शांति को अपनाएं।
सूरदास की चुनी हुई पंक्तियाँ
भोर भए गइया के पाछे मधुबन मोहि पठायो ॥
घुटनुरुनि चलत रेन तन मंडित मुख दधि लेप किए ॥
जब यह लता अति शीतल थीं तब भइ विषज्वाला के गाएँ ॥
सूरदास के बारे में
सूरदास जी हिंदी साहित्य के भक्ति काल के महान कवि और सगुण कृष्ण-भक्ति शाखा के सिरमौर माने जाते हैं। उनका जन्म 1478 में हुआ और उनका अधिकांश जीवन ब्रजभूमि में बीता। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे। पूरा परिचय और सभी विचार: सूरदास — लेखक कोश।
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