
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, पराजय को
स्वीकार कर लेना सबसे बड़ा और घातक अपराध होता है।
— जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद जी की यह ओजस्वी पंक्ति मनुष्य की अदम्य जिजीविषा और अपराजित पराक्रम की घोषणा करती है। यह कथन स्पष्ट करता है कि मानव का भाग्य पहले से तय नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्म, पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प से अपने भविष्य की रूपरेखा खुद तैयार करता है। जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियाँ या असफलताएँ अंतिम सत्य नहीं होतीं, बल्कि बिना संघर्ष किए हार मान लेना और पराजय को सहजता से स्वीकार कर लेना ही सबसे बड़ा और घातक अपराध है। प्रसाद जी का समग्र साहित्य निराशा और पलायनवाद के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है, जहाँ उनके पात्र कठिनाइयों से घुटने टेकने के बजाय उनसे टकराना बेहतर समझते हैं। छायावादी युग के इस महाकवि का मिजाज मूलतः आशावादी, स्वाभिमानी और राष्ट्र-चेतना से ओत-प्रोत था, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगाने का प्रयास करता है।
आज के इस आधुनिक और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दौर में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आज जब युवा छोटी-छोटी असफलताओं से निराश होकर मानसिक तनाव या पलायन का शिकार हो जाते हैं, तब प्रसाद जी का यह विचार उन्हें आत्मबल और संबल प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि करियर, रिश्तों या जीवन के किसी भी मोर्चे पर मिलने वाली असफलता से डरने के बजाय अपनी कमियों को सुधारते हुए फिर से प्रयास करना चाहिए। यह कथन हमें याद दिलाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी प्रतिकूल हों, यदि मनुष्य के भीतर लड़ने की इच्छाशक्ति जीवित है, तो वह हर मुश्किल को पार कर सकता है। हार को जीवन की अंतिम इबारत मान लेना मनुष्य की अपनी ऊर्जा का अपमान है, और यही संदेश आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा जीवन-मंत्र है।
जयशंकर प्रसाद की चुनी हुई पंक्तियाँ
जयशंकर प्रसाद के बारे में
जयशंकर प्रसाद (1889–1937) आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने अपनी कविताओं, नाटकों और कथाओं में भारतीय संस्कृति और मानवीय भावनाओं का अनूठा चित्रण किया। पूरा परिचय और सभी विचार: जयशंकर प्रसाद — लेखक कोश।
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