
संस्कृति हमारी पहचान है, एकता ही हमारी
शान है, इस पर हमें पूरा अभिमान है।
— मैथिलीशरण गुप्त
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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्ति भारत की मूल आत्मा को
मैथिलीशरण गुप्त की चुनी हुई पंक्तियाँ
अब भी बह रहा है उत्तराधिकार में वही रक्त, है वही देश, वही राज्य, वही है भक्त।
समाज में न्याय मिले सबको, यह सबसे बड़ा धर्म है, अन्याय सहना और करना दोनों ही महाकर्म-धर्म है।
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का मर्म होना चाहिए।
जिसकी बूँदों से सींचा गया यह वतन, वही है हमारी माटी का पावन चन्दन।
छोड़ो कल की बातें, कल का इतिहास पुराना, नए दौर में लिखो मिलकर नया जमाना।
प्रेम वह पवित्र बंधन है जो दिलों को जोड़ता है, वैर-भाव और नफरत का हर अंधकार तोड़ता है।
अब तो उठो, जागो, देश की पुकार सुनो, अपनी मातृभूमि के लिए कुछ महान करो।
मैथिलीशरण गुप्त के बारे में
मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) आधुनिक हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रमुख और राष्ट्रकवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक सुधार का संदेश दिया। उनकी रचना 'भारत-भारती' ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशवासियों में देशभक्ति की अलख जगाई थी। पूरा परिचय और सभी विचार: मैथिलीशरण गुप्त — लेखक कोश।
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