
पत्थरों की इस नगरी में, शीशे
का घर मैंने बनाया है।
— अमृता प्रीतम
अमृता प्रीतम (1919–2005) की यह पंक्ति आज भी उतनी ही सटीक लगती है। नीचे उनकी चुनी हुई पंक्तियाँ पढ़िए।
अमृता प्रीतम की चुनी हुई पंक्तियाँ
जिंदगी के सफर में मैंने जो भी महसूस किया, उसे बिना डरे कागज़ पर उतार दिया।
रसीदी टिकट मेरी आत्मकथा है, जिसमें मैंने अपने जीवन के पन्नों को बिना किसी पर्दे के खोला है।
एक सी वारिस शाह जिन्हाँ बोली थी पिच्छ, अज्ज लक्खां वारिस शाह तूं कह्रैं उत्थै विच्छ।
आज़ादी सिर्फ सांस लेना नहीं, अपने विचारों से जीने का नाम है।
प्रेम किसी पहचान का मोहताज नहीं होता, यह तो बस आत्मा का आत्मा से संवाद है।
प्यार किसी कानून का मोहताज नहीं होता, यह बगावत है जो दिल से होती है।
लोक आखदे ने वारिस शाह नूं, दिलों दा मीर। अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं, कितो कबरों बोल।
अमृता प्रीतम के बारे में
अमृता प्रीतम बीसवीं सदी की एक महान और प्रख्यात पंजाबी तथा हिंदी कवयित्री थीं। उन्हें विभाजन की त्रासदी और नारी-वेदना की सबसे सशक्त आवाज़ माना जाता है। वह साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला थीं। पूरा परिचय और सभी विचार: अमृता प्रीतम — लेखक कोश।
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