
युद्ध बीच सुवीर ह्वै मरिहैं।
— गुरु गोबिंद सिंह
गुरु गोबिंद सिंह जी की यह पंक्ति ओजस्वी ‘वीर रस’ का प्रतीक है, जिसका अर्थ है धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए युद्धभूमि में एक सच्चे वीर की भांति लड़ते हुए बलिदान हो जाना। गुरु जी का मिजाज एक महान ‘संत-सिपाही’ का था, जिसमें उच्च अध्यात्म के साथ-साथ अभूतपूर्व शौर्य और स्वाभिमान का अद्भुत संगम दिखाई देता है। वे कायरतापूर्ण जीवन की अपेक्षा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त करने को श्रेष्ठ मानते थे। उनकी वाणी में निर्भयता, अटूट संकल्प और न्याय की स्थापना का प्रचंड भाव स्पंदित होता है।
आज के दौर में इस पंक्ति की प्रासंगिकता केवल भौतिक युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में निर्भीकता से खड़े रहने का संदेश देती है। आज समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, असमानता और अनैतिकता के खिलाफ लड़ना ही वास्तविक युद्ध है। आधुनिक संदर्भ में ‘सुवीर’ वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता। गुरु जी का यह विचार सिखाता है कि परिणामों से डरे बिना सत्य के मार्ग पर डटे रहना ही जीवन की सच्ची सार्थकता है।
गुरु गोबिंद सिंह की चुनी हुई पंक्तियाँ
सब पाप ते दूर रहूँ सदा रचि अपने मन मैं इह बात धरौं
गुरु गोबिंद सिंह के बारे में
गुरु गोबिंद सिंह (1666–1708) सिखों के दसवें गुरु, महान योद्धा, कवि और दार्शनिक थे। उन्होंने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध डटकर संघर्ष किया। पूरा परिचय और सभी विचार: गुरु गोबिंद सिंह — लेखक कोश।
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