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11 Oct 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
कबीर पंथी संत दादू दयाल: दादू सतगुरु मिल्या, तो भ्रम भागा दूर
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

दादू सतगुरु मिल्या, तो भ्रम भागा दूर

ज्योति प्रगटी ज्ञान की, मिट्टा सकल अंधूर

— कबीर पंथी संत दादू दयाल

संत दादू दयाल निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवि हैं, और इस साखी में वे सतगुरु की असीम महिमा का सुंदर वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जब जीवन में सच्चे गुरु

कबीर पंथी संत दादू दयाल की चुनी हुई पंक्तियाँ

दादू दयाल मरण है, जीवत ही मर जाई
बहुरि न मरण होइगो, सहज समाधि लगाई

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दादू ज्ञान बिना सब अंध है, सूझै नहीं थोर
भरम अंधियारा मटिया, सतगुरु दीन्हा ओर

हरि जन ऐसा चाहिए, सब की सेवा होई
दादू सेवक राम का, भेद न जाने कोई

हिन्दू तुरक दुइ राह है, सतगुरु दीन्हा देखि
दादू एके राम है, दूजा नाहीं लेखि

सत श्रम सांचा मानिए, आलस मेटो दूर
दादू मेहनत जो करै, पावै फल जरूर

संतन की साखी सही, जो मानै चित लाय
दादू आवागमन तैं, मुक्ति मिलै सुख पाय

भूखा भूखा क्या करै, जो कछु भोजन होय
भूखा भोजन पाइयै, तो तृप्त होवै सोय

कबीर पंथी संत दादू दयाल के बारे में

संत दादू दयाल (1544–1603) हिंदी भक्ति साहित्य की निर्गुण धारा (ज्ञानाश्री शाखा) के प्रमुख संत और कबीर पंथ से प्रभावित महान कवि थे। उन्होंने राजस्थान के नराणा में दादू पंथ की स्थापना की और समाज सुधार, मानवता तथा ईश्वर की अद्वैत सत्ता पर बल दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: कबीर पंथी संत दादू दयाल — लेखक कोश।

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वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 11 October 2026 · अपडेट: 11 October 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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