
कबीर पंथी संत दादू दयाल
संत दादू दयाल (1544–1603) हिंदी भक्ति साहित्य की निर्गुण धारा (ज्ञानाश्री शाखा) के प्रमुख संत और कबीर पंथ से प्रभावित महान कवि थे। उन्होंने राजस्थान के नराणा में दादू पंथ की स्थापना की और समाज सुधार, मानवता तथा ईश्वर की अद्वैत सत्ता पर बल दिया।
संत दादू दयाल का जन्म संवत् 1601 (सन् 1544) में हुआ था, हालांकि उनके जन्मस्थान और माता-पिता के बारे में विद्वानों में मतभेद है। उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता और उन्होंने आमेर के राजा मानसिंह जैसे शासकों को भी प्रभावित किया। उनकी वाणी 'दादूदयाल की वाणी' और 'रज्जब' द्वारा संकलित 'अंगवधू' उनके प्रमुख ग्रंथ हैं। दादू जी ने जाति-पाति, बाह्य आडंबरों और रूढ़ियों का कड़ा विरोध किया तथा हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। उनका निधन 1603 ईसवी में नराणा (राजस्थान) में हुआ, जहाँ आज भी उनकी मुख्य गद्दी स्थित है।
कबीर पंथी संत दादू दयाल के अनमोल विचार
घट घट में रमि रह्या, दूजा सृजनहार नाही
ज्योति प्रगटी ज्ञान की, मिट्टा सकल अंधूर
आशा त्रिष्णा ना मुई, कह गए संत कबीर
दादू एके राम है, दूजा नाहीं लेखि
ज्ञान बिना नर अंध है, भवसागर में सोइ
राम नाम रस पीजिये, छूटै सारे दाग
दादू बिन भगतिन पावे, मुक्ति न दूजी होई
झूठी माया के पीछे, फिरै जात सब फूल
जैसी दृष्टि सृष्टिकै, तैसा दीसै सोय
जा जाग्या तिन सब ल्हा, और सोवत जात
भूखा भोजन पाइयै, तो तृप्त होवै सोय
जो घट प्रेम न संचरै, सो घट मूरख जाए
दादू साचा साहिबहि, भजो छाड़ि सब धंध
भरम अंधियारा मटिया, सतगुरु दीन्हा ओर
दादू निर्मल मन भया, तो पावै पद सोय
दादू आवागमन तैं, मुक्ति मिलै सुख पाय
दादू ऐसा पुरुष ही, दरगाह मानै सोय
कपटी संगत छोड़िकै, भजै एक भगवान