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समाज और न्याय पर अनमोल विचार

महापुरुषों, कवियों और लेखकों के 416 विचार — कॉपी कीजिए, शेयर कीजिए।

साहित्य वही सच्चा है जो समाज के सबसे अंतिम और शोषित व्यक्ति के आँसू पोछ सके।
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जब तक समाज में असमानता और अन्याय रहेगा, मेरी लेखनी और सक्रियता कभी विश्राम नहीं लेगी।
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एक महिला और एक लेखिका के रूप में मैंने हमेशा व्यवस्था के हर अन्याय को बहुत करीब से महसूस किया।
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लोकतंत्र का असली अर्थ तब तक अधूरा है जब तक समाज के हर आखिरी इंसान को न्याय न मिले।
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कला और साहित्य के लिए यह जरूरी है कि वे समाज के यथार्थ से आँखें न चुराएं बल्कि उसका सामना करें।
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आदिवासी अधिकारों की रक्षा के बिना इस महान देश का विकास अधूरा और अर्थहीन ही रहेगा।
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सत्ता जब जनता के अधिकारों को छीने, तब प्रतिरोध करना हर नागरिक का पहला कर्तव्य है।
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आदिवासी जंगल सिर्फ ज़मीन नहीं, उनकी अस्मिता और जीवन जीने का अधिकार हैं।
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महिलाओं पर होने वाला अत्याचार इस समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो मिटता नहीं।
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अन्याय सहना और अन्याय करने वाला दोनों समाज के सबसे बड़े अपराधी होते हैं।
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समय किसी का इंतजार नहीं करता, लेकिन अन्याय के खिलाफ लड़ने का समय हमेशा अभी होता है।
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समाज में बदलाव भाषणों से नहीं, बल्कि ज़मीन पर किए गए संघर्षों और त्याग से आता है।
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साहित्य वही है जो समाज के भीतर की बेचैनी को समझ सके और उसे पाठकों तक पहुँचा सके।
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औरत होना इस समाज में एक रोज़ाना का इम्तहान है।
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समाज की बेड़ियां चाहे जितनी मजबूत हों, हौसला उससे बड़ा होता है।
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जब तक समाज में असमानता और अन्याय है, साहित्यकार चुप नहीं बैठ सकता।
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डर और पूर्वाग्रह समाज को अंदर से खोखला कर देते हैं, जैसा कि तमस में दिखाया गया है।
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रंगमंच और नाटक समाज के सीधे संवाद का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
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एक लेखक के लिए मानवीय करुणा और न्यायप्रियता सबसे बड़े मूल्य हैं।
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सत्ता और ताकत के नशे में चूर लोग हमेशा समाज के कमज़ोर तबके की आवाज़ को दबाने की कोशिश करते हैं।
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रूढ़ियों और अंधविश्वासों की बेड़ियां जब तक नहीं कटेंगी, समाज सच्ची प्रगति की राह पर नहीं चल सकता।
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कला का असली मर्म यही है कि वह समाज के अंधेरे कोनों में उम्मीद की एक छोटी सी रोशनी जला सके।
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आज़ादी का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब देश के हर आखिरी इंसान को न्याय और सम्मान मिलेगा।
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साहित्यकार का मुख्य दायित्व समाज के यथार्थ को उजागर करना और प्रगति का मार्ग दिखाना है।
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धर्म और नैतिकता के नाम पर समाज में जो पाखंड चल रहा है, उसका पर्दाफाश करना लेखक का कर्तव्य है।
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नारी की स्वाधीनता और उसका आत्मसम्मान एक स्वस्थ समाज की अनिवार्य शर्त है।
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मार्क्सवादी विचारधारा ने मुझे समाज को एक वैज्ञानिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखना सिखाया।
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राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं जब तक आर्थिक और सामाजिक न्याय न मिले।
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मध्यवर्गीय जीवन के पाखंड और कुंठाओं को उजागर किए बिना समाज का यथार्थ अधूरा रहता है।
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विवाह संस्था जब तक प्रेम की कैदी है, तब तक समाज में सच्ची स्वतंत्रता असंभव है।
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जब तक समाज में आर्थिक असमानता है, तब तक नैतिकता और धर्म के उपदेश पाखंड हैं।
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स्त्री की मुक्ति के बिना संपूर्ण समाज का विकास एक अधूरा और झूठा सपना मात्र है।
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हर सच्चा लेखक अपने युग की विसंगतियों और अन्याय के खिलाफ एक जीवंत विद्रोह होता है।
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मेहनत करने वाले हाथों को उनका वाजिब हक न मिलना इस समाज का सबसे बड़ा कलंक है।
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प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि एक निःस्वार्थ और पवित्र समर्पण की अनुभूति है।
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त्यागपत्र उपन्यास में समाज की रूढ़ियों और नारी के आत्मसम्मान का संघर्ष चित्रित है।
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समाज न्याय तभी दे सकता है जब वह हर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करे।
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वासना में केवल अधिकार की भावना होती है, जबकि प्रेम में पूरी तरह मिट जाने की चाह होती है।
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अन्याय के आगे सिर झुकाना,
कायरता का पाप है भाई!
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जब तक भेद-भाव रहेगा समाज में, मेरा विद्रोही स्वर चुप न रहेगा।
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समाज में जब तक अन्याय रहेगा, मेरी कविता तलवार बनकर लड़ेगी।
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साहित्य समाज का दर्पण है जो उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य को स्पष्ट रूप से दिखाता है।
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ज्ञान और शिक्षा के बिना किसी भी समाज या राष्ट्र का वास्तविक विकास असंभव है।
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संस्कृति और परंपरा हमारी जड़ें हैं, जिनसे कटकर कोई भी समाज जीवित नहीं रह सकता।
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स्वतंत्रता किसी भी मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसके बिना जीवन अधूरा है।
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साहित्यकार की कलम में समाज की सोई हुई चेतना को जगाने की असीम शक्ति होती है।
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सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना कठिन अवश्य है, पर अंततः विजय उसी की होती है।
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जो समाज अपने अतीत को भूल जाता है, उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
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सच्ची वीरता वही है जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर दे और सत्य का साथ दे।
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स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और देश के हित में सोचना ही सच्ची मनुष्यता है।
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साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं, यह समाज की आत्मा को जगाने की शक्ति है।
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जो अन्याय सहता है और उसका विरोध नहीं करता, वह उस अन्याय का भागीदार बनता है।
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प्रेम और करुणा के बिना हृदय कठोर हो जाता है, और समाज में दरारें पड़ जाती हैं।
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साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसकी अंतरात्मा की पुकार भी है।
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नारी का अपमान करने वाला समाज कभी भी महान या सभ्य नहीं कहला सकता।
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समाज की झूठी प्रतिष्ठा और पाखंड के खिलाफ लिखना मेरा सबसे बड़ा धर्म रहा है।
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एक सच्चे लेखक का काम न्याय के पक्ष में खड़े होना और सच कहना है।
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रूढ़िवादिता और अंधविश्वास ने हमारे समाज की गति को हमेशा रोकने का ही काम किया है।
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जिस समाज में न्याय नहीं, वहाँ मानवता की कल्पना करना भी व्यर्थ है।
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सच्चा प्रेम त्याग मांगता है, अधिकार जताना प्रेम का स्वभाव नहीं।
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समाज की रूढ़ियाँ इंसान की प्रगति की सबसे बड़ी बेड़ियाँ होती हैं।
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जब तक समाज में पाखंड जिंदा रहेगा, व्यंग्यकार की प्रासंगिकता बनी रहेगी।
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धर्म के नाम पर पाखंड फैलाने वाले समाज के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं।
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समाज में सच्चाई बोलना सबसे बड़ा अपराध मान लिया गया है।
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जनता की आँखों में धूल झोंकना ही आज के राजनेताओं का एकमात्र बचा हुआ समाज-सुधार है।
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आजकल सच बोलना एक ऐसा अपराध है जिसके लिए समाज आपको तुरंत बहिष्कृत कर देता है।
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न्याय की तराजू अब सिद्धांतों से नहीं, बल्कि वजनदार थैलियों से तौली जाती है।
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लोग भूल गए हैं कि कविता सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज का आईना है।
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जो लोग डरते नहीं हैं, वे सच बोलने का साहस रखते हैं और समाज की आँख में आँख डालकर देखते हैं।
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व्यवस्था के खिलाफ खड़े होना और हर अन्याय पर सवाल उठाना ही एक सच्चे नागरिक का सबसे बड़ा धर्म है।
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उनकी कविता 'आत्महत्या के विरुद्ध' और 'हे जनपद!' जैसी रचनाएँ समाज के गहरे यथार्थ से जुड़ी हैं।
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"मुझे ताकत दो कि मैं अन्याय के खिलाफ लिख सकूँ" — यही उनकी संपूर्ण काव्य-यात्रा का मूल स्वर था।
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वे ट्रेड यूनियन गतिविधियों से भी जुड़े रहे और मजदूरों के अधिकारों के लिए आजीवन मुखर रहे।
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सच कड़वा जरूर होता है, मगर उसकी नींव पर ही समाज टिका है।
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जब तक समाज में असमानता रहेगी, हमारी कविता संघर्ष करती रहेगी।
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न्याय की लड़ाई लंबी हो सकती है, लेकिन जीत हमेशा सच की होती है।
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समाज में फैले अंधकार को जो दूर करे, वही इंसान इस धरती पर सच्चा सूरज बने।
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अन्याय के आगे झुकना सबसे बड़ा पाप है, अत्याचार से लड़ना ही मनुष्य का प्रताप है।
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जो झुक गया समाज के हर गलत इशारे पर, उसने बेच दिया अपना जमीर बाज़ार में आकर।
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जीप पर सवार इल्लियाँ और भ्रष्टाचार पर उनका व्यंग्य समाज की सच्चाई को उजागर करता है।
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समाज में जब तक न्याय जिंदा है, तब तक इंसानियत की उम्मीद बाकी है।
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इंसाफ की तराजू झुकी है जहाँ तलक ज़ौक़, समाज की रूह का हर एक दिया बुझा मिला।
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चरित्रहीन व्यक्ति चाहे कितना भी पढ़-लिख ले, समाज में वह कभी आदरणीय नहीं बनता।
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न्यायपूर्ण ढंग से कमाया गया धन ही मनुष्य को वास्तविक सुख और शांति देता है।
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जो मनुष्य दूसरों के दुख को अपना समझता है, वही समाज में आदरणीय बनता है।
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न्यायपूर्ण शासन वही है जो अपने राज्य के सबसे कमजोर व्यक्ति की रक्षा करे।
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युद्ध के मैदान में पीछे हटने वाले कायर होते हैं, वीर वही हैं जो धर्म और न्याय के खातिर डटे रहते हैं।
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समाज में फैले अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना ही हर सच्चे इंसान का पहला कर्तव्य है।
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सो क्यो मंदा आखीऐ जितु जम्हि राजान। (उस नारी को बुरा क्यों कहें, जो राजाओं और महान पुरुषों को जन्म देती है।)[समाज-न्याय]
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इस संपूर्ण जगत को एक ही चेतना का विस्तार देखना ही वास्तविक न्याय है।
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जब तक समाज का हर व्यक्ति भगवान के साथ अपना संबंध नहीं जोड़ेगा, तब तक सच्ची शांति असंभव है।
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केवल भौतिक नियमों से चलने वाला समाज कभी भी नैतिक और सुखी नहीं हो सकता; उसमें आध्यात्मिकता जरूरी है।
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स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।
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ब्रिटिश शासन के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना हर भारतीय का कर्तव्य है।
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मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म अपनी आत्मा की पुकार सुनना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना है।
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जब तक समाज में भय और गुलामी की मानसिकता है, तब तक कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता।
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सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने वाले को अंततः समाज और इतिहास का समर्थन मिलता है।
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जिस समाज में न्याय नहीं होता, वहां शांति और प्रगति दोनों की संभावना समाप्त हो जाती है।
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निर्भयता के बिना न तो ज्ञान का कोई मूल्य है और न ही किसी अधिकार की प्राप्ति संभव है।
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शिक्षा वह माध्यम है जो मनुष्य को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और आत्मनिर्भर बनाती है।
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समाज में न्याय तभी स्थापित हो सकता है जब हर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार मिले।
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प्रेम और आदर से ही समाज में एकता और बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ किया जा सकता है।
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वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, पर देशहित और न्याय के लिए सबको एकजुट होना चाहिए।
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अंग्रेजों की न्यायप्रियता में मेरा अटूट विश्वास था, लेकिन बाद में मेरी आंखें खुल गईं।
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हमें केवल अधिकारों की मांग नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए।
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सुधारों की गति भले ही धीमी हो, लेकिन यदि वे न्याय और सत्य पर आधारित हों, तो वे समाज में स्थायी परिवर्तन लाते हैं।
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हमें अपनी मातृभाषा के विकास के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान को अपनाना चाहिए, तभी समाज का सर्वांगीण विकास संभव है।
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असहमति लोकतंत्र का एक अनिवार्य अंग है, लेकिन इसका उद्देश्य देश और समाज का अहित करना नहीं बल्कि सुधार होना चाहिए।
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समाज सुधार के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का मार्ग कभी भी प्रशस्त नहीं हो सकता।
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स्त्री शिक्षा के बिना समाज का वास्तविक विकास कभी संभव नहीं हो सकता है।
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अज्ञानता और कुप्रथाएं समाज की सबसे बड़ी शत्रु हैं, जिन्हें शिक्षा से ही हराया जा सकता है।
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समाज सुधार का मार्ग कठिन और कांटों भरा होता है, पर सत्य की जीत हमेशा होती है।
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ज्ञान का प्रकाश ही समाज की अंधकार रूपी अज्ञानता को दूर कर सकता है।
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बाल विवाह और बहुविवाह जैसी कुप्रथाएं हमारे समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक थीं।
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समाज में हर व्यक्ति को जीने और आगे बढ़ने का समान अधिकार मिलना चाहिए।
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सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना ही एक सच्चे इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
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ज्ञान का प्रकाश ही समाज में फैली हुई अज्ञानता और अंधविश्वास के गहरे अंधकार को पूरी तरह से मिटा सकता है।
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जिस समाज में महिलाओं और वंचितों को उनका अधिकार नहीं मिलता, उस समाज की प्रगति केवल एक छलावा मात्र है।
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सत्य के मार्ग पर चलने वाले को समाज के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, पर अंततः विजय सत्य की ही होती है।
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समाज सुधार का कार्य किसी पुरस्कार या प्रशंसा की अपेक्षा के बिना, केवल निस्वार्थ भाव से किया जाना चाहिए।
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समय और अवसर का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन के साथ-साथ समाज का भी कल्याण कर सकता है।
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मानव समाज की भलाई और स्वतंत्रता ही मेरा सर्वोच्च धर्म और कर्तव्य है।
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अंधविश्वास और रूढ़ियाँ समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा होती हैं।
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महिलाओं को शिक्षा और अधिकार दिए बिना समाज का उत्थान असंभव है।
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प्रेस की स्वतंत्रता जनता की आवाज उठाने और न्याय पाने का सबसे बड़ा साधन है।
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समाज सुधार का मार्ग कठिन होता है, लेकिन सत्य की विजय निश्चित है।
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जातिगत भेदभाव और छुआछूत समाज को अंदर से खोखला कर रहे हैं।
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न्याय, समानता और स्वतंत्रता के बिना किसी भी सभ्य समाज की कल्पना करना पूरी तरह से असंभव है।
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पाश्चात्य विज्ञान और आधुनिक शिक्षा को अपनाकर ही हमारा समाज वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ सकता है।
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समाचार पत्र और स्वतंत्र प्रेस जनता की आवाज़ उठाने और समाज में वैचारिक क्रांति लाने का माध्यम हैं।
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स्वतंत्र चिंतन और विवेकशील दृष्टि के बिना कोई भी समाज बौद्धिक रूप से जीवित नहीं रह सकता।
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भाषा और साहित्य का विकास समाज के वैचारिक उत्थान और चेतना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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प्रेस की स्वतंत्रता जनमानस को जागरूक करने और समाज सुधार का सबसे सशक्त माध्यम है।
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सामाजिक न्याय और समानता के बिना किसी भी राष्ट्र की सच्ची प्रगति संभव नहीं है।
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उन्होंने समाज के भारी विरोध के बावजूद दलित और मुस्लिम बालिकाओं को शिक्षित किया।
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फ़ातिमा शेख़ ने अपनी जान की परवाह किए बिना रूढ़िवादी समाज का डटकर मुकाबला किया।
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ज्ञान का प्रकाश बांटने से ही समाज में फैली हुई अज्ञानता की दीवारें ढहती हैं।
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जब नारी शिक्षित होती है, तो पूरी पीढ़ी और पूरा समाज नई दिशा पाता है।
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समाज में बराबरी और न्याय का सूरज बिना शिक्षा के कभी नहीं उग सकता।
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समय बहुत मूल्यवान है, इसका हर पल समाज के उत्थान में लगाना चाहिए।
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सच्ची दोस्ती वही है जो अच्छे विचारों के साथ मिलकर समाज सुधार का बीड़ा उठाए।
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अपने अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देना ही असली जीवन है।
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अन्याय के खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
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हमारे तीर-कमान अन्याय के अंधेरे को चीरकर न्याय का सवेरा लेकर आएंगे।
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अन्याय के अंधेरे को चीरने के लिए बगावत का सूरज खुद ही उगाना पड़ता है।
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सिदो और कान्हू का आह्वान था कि अन्याय के आगे झुकने से बेहतर है कि लड़ते हुए प्राण त्याग दिए जाएं।
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अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के बिना किसी भी समाज का स्वतंत्र अस्तित्व संभव नहीं है।
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मेहनत करने वाले के पसीने पर पलने वाले परजीवियों का खात्मा ही न्यायसंगत समाज की नींव है।
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अन्याय के विरुद्ध समय पर उठाया गया कदम ही आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करता है।
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जो समाज अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं जानता, वह इतिहास में हमेशा कुचला जाता है।
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शोषण मुक्त समाज की स्थापना के लिए हर संथाल को एकजुट होकर हुंकार भरनी होगी।
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भगवान एक हैं और हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं, बस अपने अधिकारों के लिए जागना होगा।
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आदिवासी समाज को अंधविश्वास और बुरी आदतों को छोड़कर एकता का पाठ पढ़ना होगा।
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अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना हर इंसान का पहला और सबसे बड़ा कर्तव्य होता है।
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उलगुलान का अर्थ केवल विद्रोह नहीं, बल्कि समाज में सुधार और न्याय की स्थापना है।
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झारखंड के जंगलों और पहाड़ों की रक्षा करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
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वीरों की यह भूमि बलिदान मांगती है, और हम अपने अधिकारों के लिए पीछे नहीं हटेंगे।
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कायर बनकर घुटने टेकने से बेहतर है कि हम अपने अधिकारों और स्वाभिमान के लिए लड़ते हुए प्राण त्याग दें।
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मदिरा और कुरीतियों का त्याग करो, मन और कर्म से पवित्र होकर ही हम अन्याय के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।
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बिखरा हुआ समाज हमेशा हारता है, हमारी आपसी एकता ही अत्याचारियों की सबसे बड़ी हार बनेगी।
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दूसरों के अन्यायपूर्ण नियमों को सहने की बजाय हमेशा सत्य, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर चलो।
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सफलता तभी मिलेगी जब समाज का हर व्यक्ति अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर पूरी हिम्मत से लड़ेगा।
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किसान ही इस देश की रीढ़ हैं और उन्हीं के परिश्रम पर पूरा समाज टिका हुआ है।
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क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना है।
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मेहनत करने वाले को उसका हक मिलना ही चाहिए, यही सच्चा धर्म और समाजवाद है।
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हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध है।
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जब तक खेत पर किसान का अधिकार नहीं होगा, तब तक देश वास्तविक रूप से स्वतंत्र नहीं माना जाएगा।
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डर और गुलामी की मानसिकता को छोड़कर ही किसान अपने अधिकारों को पा सकता है।
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हमारा लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना है जहाँ कोई भूखा न सोए और किसी का शोषण न हो।
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लेखनी और वाणी दोनों का उपयोग जनहित और समाज सुधार के लिए होना चाहिए।
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कैसे लोगे मालगुजारी, लठ हमारा जिंदाबाद! अन्याय के खिलाफ संघर्ष ही सच्चा धर्म है।
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पसीना बहाने वाला किसान ही सच्चा समाज निर्माता है, शोषक परजीवियों का कोई हक नहीं।
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किसानों और मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने वाली चेतना ही सच्ची शिक्षा है।
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अधिकार मांगने से नहीं छीनने से मिलते हैं, अब हाथ जोड़ने का नहीं संघर्ष का समय है।
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सच्चा साधु वही है जो अन्याय के सामने सिर न झुकाए और सत्य के लिए संघर्ष करे।
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दुनिया को अन्न देने वाला किसान किसी की दया का नहीं, अपने अधिकार का हकदार है।
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एक व्यक्ति जो अपने विचार व्यक्त करता है, वह समाज को आगे ले जाने में सबसे बड़ा योगदान देता है।
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सच्चा आनंद किसी नई खोज को करने और उसके जरिए समाज का भला होते देखने में निहित है।
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प्रेम की अभिव्यक्ति और परोपकार की भावना ही मानव समाज को सबसे अधिक मजबूत बनाती है।
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अन्याय हर जगह न्याय के लिए एक खतरा है।
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जो व्यक्ति अन्याय का विरोध किए बिना स्वीकार करता है, वह वास्तव में उसमें भागीदार बनता है।
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हिंसा अंततः कड़वाहट ही पैदा करती है और समाज को नष्ट कर देती है, इससे कभी शांति नहीं मिलती।
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किसी भी स्थान पर होने वाला अन्याय, हर जगह के न्याय के लिए एक सीधा खतरा है।
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हिंसा अंततः सृजन करने के बजाय हमेशा विनाश ही करती है और समाज को खंडित करती है।
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सच्ची शांति केवल तनाव की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह न्याय की सक्रिय उपस्थिति है।
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कोई भी व्यक्ति तब तक पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक कि समाज का हर वर्ग स्वतंत्र न हो।
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यदि आप न्याय करने बैठेंगे, तो लोगों से प्रेम करने का समय नहीं मिलेगा।
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एक सच्चा नेता भय से नहीं, बल्कि अपने आदर, न्याय और करुणा से वफादारी पाता है।
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जो सही और न्यायसंगत है उसे देखकर भी न करना, भीतर साहस की कमी का सबसे बड़ा प्रमाण है।
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बुराई और अन्याय का उत्तर निष्पक्ष न्याय से दो, और उपकार का उत्तर सदा भलाई व कृतज्ञता से दो।
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न्याय का अर्थ है कि हर व्यक्ति को उसका उचित अधिकार मिले।
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कानून, निष्पक्ष न्याय की अनुपस्थिति में और कुछ नहीं बल्कि व्यवस्था का मुखौटा है।
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जो खुद पर शासन करना जानता है, वही वास्तव में समाज और दुनिया पर शासन करने योग्य होता है।
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उस व्यक्ति को आलोचना करने का अधिकार है जिसके पास मदद करने का दिल हो।
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जो लोग दूसरों को आज़ादी नहीं देते, वे खुद भी इसके हकदार नहीं होते हैं और ईश्वर के न्याय में भी नहीं टिक सकते।
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ज्ञान सबसे बेहतरीन हथियार है, इसलिए शिक्षा को समाज के हर व्यक्ति तक पहुँचाना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए।
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समाज में न्याय तब तक संभव नहीं है जब तक लोग अन्याय के खिलाफ बोलना न सीखें।
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एक सच्चा लेखक वह है जो समाज के पाखंड को बिना डरे सबके सामने उजागर कर सके।
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समाज को बदलना है तो पहले खुद की सोच को बदलना होगा।
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स्वतंत्रता और न्याय के बिना कोई समाज महान नहीं बन सकता।
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सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को स्वतंत्र सोचने और अन्याय के खिलाफ लड़ने की दृष्टि दे।
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समाज में असली क्रांति तब आती है जब हर व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो।
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न्याय केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि इंसानी समाज की बुनियादी जरूरत है।
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जो लोग दूसरों के दुखों को महसूस नहीं कर सकते, वे जीने का अधिकार खो चुके हैं।
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जो लोग खुद को सुधार लेते हैं, वे समाज को बदलने की सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं।
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करुणा असल में न्याय से बहुत आगे की चीज़ है, क्योंकि करुणा ही प्रेम का दूसरा नाम है।
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कानून तब तक न्याय नहीं दे सकता जब तक समाज के दिलों में करुणा न हो।
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शिक्षा ही वह चाबी है जो समाज के हर एक पीड़ित व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता के द्वार खोलती है।
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महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और शिक्षा मिले बिना कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
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कविता केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, यह समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाने का एक सशक्त हथियार है।
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पाखंड और अंधविश्वास समाज के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जिनसे हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
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अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना हर जागरूक नागरिक और कवि का सबसे पहला और बड़ा कर्तव्य है।
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समतावादी समाज की स्थापना ही मेरा मुख्य सपना और मेरी संपूर्ण कविता का मूल उद्देश्य है।
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समाज में समानता लाना हमारा मुख्य कर्तव्य है, तभी न्याय की स्थापना होगी।
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जो लोग दूसरों के अधिकारों को छीनते हैं, समाज उन्हें कभी माफ नहीं करता।
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समानता और भाईचारा ही एक स्वस्थ और सुंदर समाज की असली पहचान हैं।
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पाखंडी और शोषक धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देना ही सच्चा समाज सुधार है।
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शिक्षा ही वह हथियार है जो मनुष्य को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है।
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समाज में समानता स्थापित किए बिना सच्ची स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती।
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तर्कहीन और विवेकहीन परंपराओं का अंधानुकरण समाज के पतन का सबसे बड़ा कारण है।
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हर व्यक्ति को आत्म-सम्मान के साथ जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त होना चाहिए।
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पाखंडी पुरोहितवाद ने समाज को जातियों में बांटकर इंसानियत को कमजोर किया है।
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जब तक समाज से असमानता समाप्त नहीं होती, तब तक असली विकास असंभव है।
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जो लोग खुद को श्रेष्ठ मानते हैं, वे असल में मानवीयता और समानता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
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सवाल पूछने की आज़ादी ही किसी भी समाज की तरक्की और बौद्धिक विकास की पहली सीढ़ी है।
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जो समाज अपनी महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं देता, वह कभी भी सभ्य नहीं कहला सकता।
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ढोंग और पाखंड के सहारे चलने वाली व्यवस्थाएं कभी भी स्थायी और न्यायसंगत नहीं हो सकतीं।
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बुद्धि और विवेक को ताक पर रखकर किया गया अंधानुकरण समाज को गर्त में ले जाता है।
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श्रम का सम्मान ही सच्ची मानवता है, किसी को छोटा या बड़ा समझना सरासर अन्याय है।
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न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए ऊंच-नीच के भेदभाव को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा।
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स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे पाने के लिए हमें शिक्षा और संघर्ष का मार्ग अपनाना होगा।
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स्त्री और पुरुष दोनों समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं, यदि एक कमजोर हो तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।
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समाज में फैले अंधविश्वास और रूढ़ियों को तोड़े बिना वास्तविक स्वतंत्रता और समानता हासिल नहीं की जा सकती।
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किसानों और मजदूरों की मेहनत पर यह समाज टिका है, इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है।
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सत्य की खोज और समाज सेवा ही मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिए।
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जाति व्यवस्था इंसान को बांटती है और समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करती है।
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गुलामगिरी और जातिभेद को मिटाए बिना समाज में समानता और मानवता की स्थापना कभी नहीं हो सकती।
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इंसानियत और भाईचारा ही किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी और सच्ची पहचान होते हैं।
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हर मनुष्य को जन्म से ही स्वतंत्रता और बराबरी का अधिकार मिला है, इसे कोई छीन नहीं सकता।
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समाज में फैले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और उसका विरोध करना ही हर जागरूक नागरिक का धर्म है।
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महिलाओं को उनके अधिकार और सम्मान दिलाए बिना देश और समाज का सच्चा विकास असंभव है।
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स्वार्थ और पाखंड को छोड़कर यदि हम सेवा का मार्ग चुनें, तो समाज का हर दुख दूर हो सकता है।
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मेहनतकशों के पसीने की सही कीमत और उनके श्रम का सम्मान ही सच्ची न्याय व्यवस्था है।
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शिक्षा वह हथियार है जिससे समाज की हर बेड़ी को तोड़ा जा सकता है।
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अज्ञानता और अंधविश्वास समाज के सबसे बड़े और भयंकर शत्रु हैं।
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समाज में बदलाव लाने के लिए खुद को पहले त्याग के मार्ग पर चलना होगा।
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डरकर जीने से बेहतर है कि अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए जिया जाए।
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समाज में फैले पाखंड और झूठे रिवाजों को तोड़ने के लिए तर्क की कसौटी पर हर परंपरा को कसना अनिवार्य है।
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सच्ची मित्रता वही है जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने में आपका साथ दे और आपको सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।
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समय किसी के लिए नहीं रुकता, इसलिए हर पल का उपयोग समाज के उत्थान और गरीबों की सेवा में करना चाहिए।
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प्रेम और करुणा के बिना कोई भी समाज मानवीय नहीं बन सकता, हर प्राणी के प्रति दया भाव रखना ही सच्ची इंसानियत है।
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ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से किया गया कठिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता, उसका परिणाम समाज को दिशा देता है।
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जात-पात और छुआछूत की दीवारें इंसानों को बांटती हैं, इन्हें गिराकर समतावादी समाज की स्थापना ही सच्चा न्याय है।
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जो लोग अन्याय सहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते, वे खुद अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को बढ़ावा देते हैं।
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खुद को जोखिम में डालकर भी दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना ही एक सच्चे और जागरूक नागरिक का परम कर्तव्य है।
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समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वासों के खिलाफ खड़ा होना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है।
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हर इंसान को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए, चुप रहना अन्याय का साथ देना है।
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सेवा और त्याग से ही समाज में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
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न्याय और समानता के बिना किसी भी समाज का विकास अधूरा और अधूरा ही रहता है।
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लोकतंत्र की सफलता के लिए एक प्रबुद्ध और शिक्षित नागरिक समाज का होना अनिवार्य है।
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पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को सही दिशा दिखाना और सत्ता को आईना दिखाना है।
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एक शिक्षक का दर्जा समाज में सबसे ऊंचा होता है क्योंकि वह भविष्य का निर्माता है।
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न्याय के बिना समाज की कल्पना वैसी ही है जैसे रीढ़ के बिना शरीर।
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देशद्रोहियों और अन्याय के खिलाफ लड़ना ही हर इंसान का सबसे बड़ा और पहला धर्म है।
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शिक्षा और चेतना के बिना समाज में न्याय की कल्पना करना बेमानी है, जागना होगा।
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समाज में फैले अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना ही हर सच्चे इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है।
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अन्याय और अत्याचार के आगे कभी न झुकना ही एक सच्चे क्रांतिकारी की असली पहचान है।
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युवा शक्ति का एकमात्र लक्ष्य देश की स्वतंत्रता और समाज के उत्थान के लिए समर्पित होना चाहिए।
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सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने वाले को हर पल संघर्ष और बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए।
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याद रखें कि सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है।
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जब तक हम खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक हम समाज में एक नया इतिहास नहीं रच सकते।
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जीवन का सबसे बड़ा पाप अन्याय को सहन करना और उसके आगे घुटने टेकना है।
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भारत में एक ऐसी क्रांति की आवश्यकता है जो समाज की पुरानी जड़ों को हिलाकर रख दे।
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जीवन का सबसे बड़ा पाप अन्याय सहना और गलत के सामने झुक जाना है।
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जिस व्यक्ति के भीतर आत्मसम्मान नहीं है, वह समाज या राष्ट्र के लिए कभी कुछ महान नहीं कर सकता।
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जब तक हम खुद अपने अधिकारों के लिए खड़े नहीं होंगे, तब तक कोई हमें न्याय नहीं दिला सकता।
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आर्थिक आज़ादी और सामाजिक न्याय के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
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सत्ता का उपयोग विशेषाधिकार के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा के लिए है।
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सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही हम समाज में स्थाई शांति स्थापित कर सकते हैं।
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नारी शक्ति के बिना किसी भी समाज का उत्थान असंभव है।
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समाज में तब तक सच्ची शांति नहीं आ सकती जब तक हर जरूरतमंद को न्याय और सम्मान न मिले।
समाज-न्याय
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हमें सिर्फ शिकायत करने वाले नहीं बल्कि बदलाव की आंधी खुद बनकर दिखाने वाले बनना होगा।
समाज-न्याय
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स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसके लिए हमें संगठित होकर प्रयास करना होगा।
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समाज सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है, इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
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हर भारतीय को अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए।
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पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज को दिशा दिखाने का एक पवित्र माध्यम है।
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सत्य और निष्ठा के मार्ग पर चलने वाले को अंततः समाज और इतिहास दोनों में आदर मिलता है।
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निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा और पवित्र धर्म है।
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ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री पाना नहीं, बल्कि समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।
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एकता और संगठन में ही किसी भी राष्ट्र और समाज की असली शक्ति निहित होती है।
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प्रेम और बंधुत्व की भावना से ही समाज की समस्त दूरियों और कुप्रथाओं को मिटाया जा सकता है।
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जब तक शिक्षा में नैतिक मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तब तक समाज का उत्थान असंभव है।
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शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है, बल्कि यह न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे का साम्राज्य है।
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सहनशीलता और शांति ही किसी सभ्य समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है।
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न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के बिना सच्ची शांति की कल्पना नहीं की जा सकती।
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जब तक समाज में असमानता है, तब तक स्वतंत्रता अधूरी ही मानी जाएगी।
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समाजवाद का अर्थ केवल आर्थिक समानता नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा भी है।
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समाज सुधार और राजनीतिक परिवर्तन के लिए युवाओं को आगे आना ही होगा।
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अन्याय के खिलाफ चुप रहना भी एक प्रकार से अन्याय का ही समर्थन करना है।
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जब तक देश में भ्रष्टाचार है, तब तक हर नागरिक का अधिकार सुरक्षित नहीं है।
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जब अन्याय ही कानून बन जाए, तब विद्रोह करना और क्रांति लाना हर नागरिक का पवित्र कर्तव्य बन जाता है।
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जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाए बिना एक समतामूलक और स्वस्थ समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
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सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की आवाज भी शासन तक पहुँचे।
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उनके रेखाचित्रों में समाज के उपेक्षित और साधारण लोगों की असाधारण कथाएँ जीवंत हो उठी हैं।
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उनके निबंधों में राष्ट्रीय चेतना, समाज सुधार और मानवीय करुणा का स्वर बहुत प्रबल रूप से झलकता है।
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'पतितों के देश में' उनका एक ऐसा चर्चित उपन्यास है जो समाज के हाशिए के लोगों की पीड़ा को उभारता है।
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पत्रकारिता समाज की आत्मा का आईना है, जिसमें उसकी हर सच्चाई दिखती है।
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हर अन्याय के खिलाफ डट जाना ही एक सच्चे लेखक का असली धर्म है।
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स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और इसके लिए हर त्याग कम है।
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समाज में समानता और न्याय स्थापित किए बिना सच्ची स्वतंत्रता अधूरी है।
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कबीर की वाणी में समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार दिखाई देता है।
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आदमी का अधिकार बड़ा होता है, नियम और विधान तो केवल आदमी की सुविधा के लिए हैं।
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जो अपने को बहुत होशियार समझते हैं, वे अक्सर समाज की वास्तविक धारा को समझने में भूल कर बैठते हैं।
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सच्चाई के रास्ते पर चलना कठिन जरूर है, पर अंततः यही मनुष्य को समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है।
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समाज का असली न्याय वही है जहाँ सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज को भी पूरी महत्ता मिले।
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प्यार केवल एक अहसास नहीं, यह अन्याय के खिलाफ एक बड़ी बगावत है।
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ज्ञान वह पैनी धार है, जो अन्याय की हर दीवार को चीर सकती है।
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समाज की इस बेढंगी चाल में, हर संवेदनशील व्यक्ति को टूटना ही पड़ता है।
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मनुष्य की मुक्ति केवल समाज की मुक्ति के साथ ही संभव हो सकती है।
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नदी के द्वीप कविता में व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों को दर्शाया गया है।
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समाज न्याय की तलाश में तब तक भटकता है जब तक व्यक्ति खुद प्रबुद्ध न हो।
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मानुष जीवन का अधिकार, श्रम से गढ़े नया संसार, न्याय और समता से ही हो सबका सच्चा श्रृंगार।
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समाज और न्याय की रेखा, सब पर हो समान अधिकार, ऊँच-नीच का भेद मिटाकर, गूँजे बस प्रेम पुकार।
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समाज में न्याय मिले सबको, यह सबसे बड़ा धर्म है, अन्याय सहना और करना दोनों ही महाकर्म-धर्म है।
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अधिकार चाहने से पहले कर्तव्य निभाना सीखो, इस जीवन के सच्चे पथ पर आगे बढ़ना सीखो।
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जो न्याय की रक्षा करता, जग उसका मान बढ़ाता है, अत्याचार के आगे जो झुके, वह खुद मिट जाता है।
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काल चक्र सब को बस करई, राज समाज मिटावत धरई।
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जो अपने देश और समाज की भलाई नहीं सोचता, उसका जीवन व्यर्थ है।
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समाज में सुधार लाना है तो पहले अपने आचरण को सुधारो।
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समाज की सच्ची सेवा तभी संभव है जब हम हर प्राणी में एक ही ईश्वरीय चेतना का दर्शन करें।
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उनकी रचनाओं में शोषित और उपेक्षित समाज का यथार्थ चित्रण अत्यंत संवेदनशील ढंग से हुआ है।
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सच्ची मेहनत वही है जो पसीने से सींची जाए और जिसका परिणाम समाज को मिले।
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सच चाहे कितना भी कड़वा हो, पर अंततः वही समाज को सही दिशा दिखाता है।
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समाज में न्याय तब तक अधूरा है, जब तक अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को अधिकार न मिले।
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स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसके लिए हर मूल्य चुकाने को हम तैयार हैं।
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अधिकारों की रक्षा के लिए अंत तक लड़ना ही सच्ची मनुष्यता है।
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अन्याय सहना भी उतना ही बड़ा पाप है जितना अन्याय करना।
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नारी की शक्ति को कम आंकना समाज की सबसे बड़ी भूल होती है।
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अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन है, अपने को ही सहलाते रहना व्यर्थ कर देना है।
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अधिकार और कर्तव्य का सुंदर सामंजस्य ही सच्चे समाज की नींव रखता है, जहाँ हर व्यक्ति को न्याय मिले।
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शिक्षा वही सार्थक है जो मनुष्य के भीतर छिपे विवेक को जागृत कर उसे समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए।
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इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब-जब समाज में अन्याय बढ़ा है, तब-तब क्रांति का वीणापाणि स्वर गूंजा है।
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जाति-पाँति और छुआछूत जैसी कुरीतियां समाज की एकता की सबसे बड़ी शत्रु हैं।
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स्त्री शिक्षा के बिना समाज का उत्थान असंभव है।
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संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, यानी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
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मनुष्य को अपने अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना चाहिए।
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ईश्वर सर्वव्यापक, निराकार और न्यायकारी है।
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सत्य का आचरण और निष्पक्ष न्याय ही एक उन्नत और सभ्य समाज की आधारशिला है।
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स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए।
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निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची और वास्तविक पूजा है।
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ज्ञान का प्रकाश फैलते ही समाज में फैली अज्ञानता की धुंध अपने आप छंट जाती है।
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अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।
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समाज की भौतिक परिस्थितियों से ही मनुष्य की चेतना निर्धारित होती है, न कि उसकी चेतना से समाज।
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हर समाज के शासक वर्ग के विचार ही हर युग में प्रमुख और शासी विचार होते हैं।
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आधुनिक बुर्जुआ समाज, जिसने उत्पादन के इतने विशाल साधन खड़े किए हैं, उस जादूगर जैसा है जो अपनी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाता।
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एक समाज की प्रगति का सही पैमाना महिलाओं की सामाजिक स्थिति और स्वतंत्रता के स्तर से मापा जाता है।
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उत्पादन के साधनों पर कब्जा रखने वाला समाज का हर क्षेत्र नियंत्रित करता है।
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जब तक समाज वर्गों में बंटा रहेगा, तब तक न्याय और आज़ादी महज एक छलावा रहेंगे।
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विचार कभी भी समाज की भौतिक परिस्थितियों से अलग होकर स्वतंत्र रूप से नहीं पनपते।
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आर्थिक ढांचा ही समाज की राजनीति, धर्म और संस्कृति की नींव तय करता है।
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समाज में हर व्यक्ति की क्षमता के अनुसार काम और उसकी ज़रूरत के अनुसार दाम मिलना चाहिए।
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शासक वर्ग के विचार ही हर युग में समाज के सबसे प्रभावी और सर्वमान्य विचार होते हैं।
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न्याय और समाज का निर्माण बिना समानता के कभी संभव नहीं हो सकता।
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समाज की सच्ची परीक्षा यह है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
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न्याय और शांति के लिए काम करना सबसे कठिन और जोखिम भरा कार्य है।
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एकता और भाईचारे की भावना ही किसी भी समाज को अन्याय के खिलाफ एकजुट करती है।
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नदी का किनारा, कच्चा घड़ा, और असंगठित समाज, ये सब बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं।
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अन्याय सहना और अन्याय करने वाला दोनों ही समाज की नजर में अपराधी हैं, इसलिए अन्याय का हमेशा विरोध करना चाहिए।
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अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब हम अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा के साथ निभाते हैं।
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देश का युवा ही वह असली शक्ति है जो समाज की तस्वीर और तकदीर दोनों को बदल सकता है।
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क्रांति मानव जाति का एक ऐसा अधिकार है जिसके लिए हर इंसान हकदार है।
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क्रांति से हमारा मतलब अत्याचार और अन्याय की इस व्यवस्था को पूरी तरह से बदलना है।
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मेरा विश्वास है कि एक समाजवादी समाज ही मनुष्य को शोषण और अन्याय से पूरी तरह मुक्त कर सकता है।
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क्रांति महज़ खून-खराबा नहीं, बल्कि समाज के शोषक ढांचा को बदलने की पुकार है।
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जो मनुष्य इस समाज को बदलता देखना चाहता है, उसे पहले खुद को बदलना होगा।
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स्वार्थ और संकीर्णता से ऊपर उठे बिना हम एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकते।
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क्रांति कोई खूनी संघर्ष नहीं, बल्कि समाज की पुरानी सड़ चुकी व्यवस्था को बदलने की एक पवित्र सोच है।
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निडरता और अन्याय के खिलाफ बगावत ही इंसान को एक सच्चा इंसान बनाती है।
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जो मनुष्य अन्याय सहकर चुप रहता है, वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ बहुत बड़ा पाप करता है।
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समाज की सच्ची सेवा वही है जो शोषितों और पीड़ितों के जीवन में न्याय और समानता लेकर आए।
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ढकोसलों और अंधविश्वासों से मुक्त समाज का निर्माण ही हमारे सपनों का असली भारत है।
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मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है।
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कानून और व्यवस्था न्याय की राजनीतिक नीव हैं, इसके बिना समाज अधूरा है।
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समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत मानना होगा।
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किसी भी महान व्यक्ति और समाज की पहचान उसकी महिला उन्नति से होती है।
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शिक्षित बनो, संगठित रहो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो।
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छिन जाए अधिकार तो चुप रहना बुजदिलों का काम है, न्याय के लिए लड़ना ही हर इंसान का असली धर्म है।
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यदि हमें एक आदर्श समाज बनाना है, तो उसकी नींव स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर टिकी होनी चाहिए।
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अन्याय सहना और अन्याय करने वाले का साथ देना दोनों ही समाज के लिए सबसे बड़े पाप हैं।
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एकता के बिना कोई भी समाज न तो अपनी रक्षा कर सकता है और न ही तरक्की की राह पर चल सकता है।
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जिस समाज में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वह समाज कभी भी प्रगति की ऊँचाइयों को नहीं छू सकता।
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अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा सजग रहो, क्योंकि लापरवाही से ही गुलामी की जंजीरें मजबूत होती हैं।
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बिना कार्य के ज्ञान और बिना विवेक के कर्म दोनों ही समाज के लिए विनाशकारी होते हैं।
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दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
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न्याय अगर हो आधा तो पर इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
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जो न पाप से डरा, किंतु जो डरता है अन्याय से।
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प्रेम वही है जो अधिकार की भावना से मुक्त हो।
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समाज में जब तक विषमता रहेगी, शांति की कल्पना व्यर्थ है।
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अधिकारों के लिए लड़ना और न्याय पाना हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।
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साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसका मार्गदर्शक भी है।
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साहित्य समाज का वह दर्पण है जो उसकी आत्मा और भविष्य की रूपरेखा दोनों दिखाता है।
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कलाकार का एकांत समाज से कटना नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता से जुड़ने का माध्यम है।
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जब तक समाज में असमानता और अन्याय है, तब तक साहित्यकार की कलम मूक नहीं रह सकती।
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हिन्दी के साथ-साथ बांग्ला और संस्कृत पर भी उनका समान अधिकार था।
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अधिकार सुख कितना मादक किंतु स्वाधीनता से बढ़कर है क्या?
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सत्य सदा आगे बढ़ता है, बाधाएँ हार मानती हैं, न्याय की जीत अटल है।
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मनुष्यता का मोल वही है जो पीड़ित के आँसू पोंछे और अन्याय से लड़े।
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अधिकार सुख कितना मादक और क्रूर है!
अपने ही सुख के आगे सब भूल जाता है मनुष्य।
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समाज में जब तक विषमता रहेगी, क्रांति की चिनगारी कभी बुझ नहीं सकती।
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न्याय की पुकार जब गूंजती है, तो सिंहासन भी हिल जाते हैं और तानाशाही झुकती है।
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जब तक समाज में गरीब और अमीर का भेद रहेगा, साहित्य का काम समाप्त नहीं होगा।
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जिस समाज में न्याय नहीं है, वहाँ धर्म और नैतिकता का कोई अर्थ नहीं।
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त्याग के बिना प्रेम अधूरा है और न्याय के बिना समाज।
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यथार्थवादी साहित्यकार को समाज की कड़वी सच्चाइयों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
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समाज में जब तक अन्याय और अत्याचार है, तब तक चुप रहना सबसे बड़ा पाप है।
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जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥
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