
कवि
रघुवीर सहाय
1929–1990
रघुवीर सहाय हिंदी कविता के शमशेर युग के प्रमुख कवि और पत्रकार थे। वे 'दूसरा सप्तक' के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। उन्होंने आम आदमी के दैनिक जीवन और लोकतंत्र की विडंबनाओं को अपनी रचनाओं का मुख्य विषय बनाया।
25 अनमोल विचार · पूरी सूची →
रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर 1929 को लखनऊ में हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया और शुरुआत में पत्रकारिता से जुड़े। वे 'दिनमान' पत्रिका के संपादक रहे और समाचार माध्यमों में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी कविता में सड़क के आदमी, नौकरशाही और सत्ता की क्रूरता पर गहरी चोट मिलती है। उन्हें उनकी कृति 'लोग भूल गए हैं' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनका निधन 30 दिसंबर 1990 को दिल्ली में हुआ था।
रघुवीर सहाय के अनमोल विचार
आत्महत्या के विरुद्ध रघुवीर सहाय का एक अत्यंत चर्चित और वैचारिक कविता संग्रह है।
विज्ञापन · Advertisement
विज्ञापन · Advertisement
जो लोग डरते नहीं हैं, वे सच बोलने का साहस रखते हैं और समाज की आँख में आँख डालकर देखते हैं।
व्यवस्था के खिलाफ खड़े होना और हर अन्याय पर सवाल उठाना ही एक सच्चे नागरिक का सबसे बड़ा धर्म है।
पत्रकारिता हो या कविता, दोनों की कसौटी यह है कि वे सत्ता से सवाल पूछें और कमजोर का पक्ष लें।
जो इतिहास सिर्फ राजाओं और विजेताओं को याद रखता है, वह आम आदमी की कुर्बानियों को भूल जाता है।
सहनशीलता की एक सीमा होती है, जब अत्याचार हद पार कर जाए तो विरोध करना ही एकमात्र रास्ता बचता है।
वे लोग कितने भाग्यशाली हैं जो अपना काम पूरी ईमानदारी और बिना किसी शोरगुल के पूरा कर जाते हैं।
सड़क पर चलते हुए किसी साधारण आदमी की पीड़ा को महसूस करना ही सच्ची कविता की सबसे बड़ी पहचान है।
हर बड़ी सफलता के पीछे अनगिनत छोटे लोगों की मेहनत छिपी होती है, जिन्हें कभी अखबारों में जगह नहीं मिलती।
समय बहुत बलवान है, यह किसी के लिए नहीं रुकता और हर धोखेबाज को उसकी असलियत दिखा देता है।
शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि वह पैनापन है जिससे इंसान सही और गलत में फर्क करना सीखता है।
दोस्ती वही सच्ची है जो संकट के समय बिना किसी शर्त के आपके साथ चट्टान की तरह खड़ी रहे।
प्रेम कोई दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में एक-दूसरे का साथ निभाना और भरोसा रखना है।