
समाज सुधारक
ज्योतिबा फुले
1827–1890
महात्मा ज्योतिबा फुले (1827–1890) एक महान समाज सुधारक, क्रांतिकारी विचारक और लेखक थे। उन्होंने महाराष्ट्र में दलितों, शोषितों और महिलाओं के उद्धार के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
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महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा में हुआ था। उन्होंने समाज में फैली छुआछूत, जातिप्रथा और अंधविश्वास के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने 1848 में पुणे में देश का पहला बालिकाओं के लिए विद्यालय खोला। उन्होंने किसानों और मजदूरों के अधिकारों की आवाज उठाई तथा 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। उनकी प्रमुख पुस्तकें 'गुलामगिरी' और 'किसान का कोड़ा' समाज सुधार के इतिहास में मील का पत्थर हैं।
ज्योतिबा फुले के अनमोल विचार
विद्या के बिना बुद्धि गई, बुद्धि के बिना नीति गई, नीति के बिना गति गई, गति के बिना वित्त गया, वित्त के बिना शूद्र गए, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे पाने के लिए हमें शिक्षा और संघर्ष का मार्ग अपनाना होगा।
स्त्री और पुरुष दोनों समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं, यदि एक कमजोर हो तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।
शूद्रों और अतिशूद्रों की मुक्ति का एकमात्र मार्ग केवल शिक्षा और ज्ञान का प्रसार है।
पाखंडी और शोषक लोग धर्म की आड़ में आम जनता का शोषण करते हैं, जिसका विरोध करना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।
समाज में फैले अंधविश्वास और रूढ़ियों को तोड़े बिना वास्तविक स्वतंत्रता और समानता हासिल नहीं की जा सकती।
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अज्ञानता सभी बुराइयों की जड़ है और ज्ञान ही मनुष्य को सही और गलत में अंतर करना सिखाता है।
किसानों और मजदूरों की मेहनत पर यह समाज टिका है, इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है।
छुआछूत एक अभिशाप है जो इंसानियत को कलंकित करता है, इसे जड़ से उखाड़ फेंकना होगा।
जाति व्यवस्था इंसान को बांटती है और समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करती है।
माता-पिता बच्चों के पहले गुरु होते हैं, इसलिए बच्चों को संस्कारित और शिक्षित करना हमारा पहला कर्तव्य है।
गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए वैचारिक क्रांति और शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है।
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गुलामगिरी और जातिभेद को मिटाए बिना समाज में समानता और मानवता की स्थापना कभी नहीं हो सकती।
सत्य के मार्ग पर चलने वाले को हमेशा विरोध और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, पर जीत उसी की होती है।
इंसानियत और भाईचारा ही किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी और सच्ची पहचान होते हैं।
मेहनत करने वाले मजदूर और किसान ही इस पूरे संसार के असली निर्माता और आधार हैं।
धर्म का असली अर्थ इंसान की भलाई और सेवा करना है, न कि लोगों को आपस में बांटना।
हर मनुष्य को जन्म से ही स्वतंत्रता और बराबरी का अधिकार मिला है, इसे कोई छीन नहीं सकता।
अज्ञानता और अंधकार को मिटाने के लिए ज्ञान रूपी प्रकाश का हर घर में पहुंचना बहुत जरूरी है।
जाति, वंश या कुल से कोई महान नहीं बनता, इंसान अपने कर्मों और विचारों से महान बनता है।
समाज में फैले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और उसका विरोध करना ही हर जागरूक नागरिक का धर्म है।
महिलाओं को उनके अधिकार और सम्मान दिलाए बिना देश और समाज का सच्चा विकास असंभव है।
स्वार्थ और पाखंड को छोड़कर यदि हम सेवा का मार्ग चुनें, तो समाज का हर दुख दूर हो सकता है।
मेहनतकशों के पसीने की सही कीमत और उनके श्रम का सम्मान ही सच्ची न्याय व्यवस्था है।