
समाज सुधारक
राजा राममोहन राय
1772–1833
राजा राममोहन राय (1772–1833) आधुनिक भारत के जनक और ब्रह्म समाज के संस्थापक थे। उन्होंने सती प्रथा के अंत और महिला अधिकारों के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया।
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राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर में हुआ था। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और 'आधुनिक भारत का जनक' माना जाता है। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की, जो धार्मिक कुप्रथाओं और मूर्तिपूजा के खिलाफ था। लॉर्ड विलियम बेंटिक के साथ मिलकर उन्होंने 1829 में सती प्रथा के खिलाफ कानून बनवाया। पाश्चात्य शिक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया।
राजा राममोहन राय के अनमोल विचार
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प्रेस की स्वतंत्रता जनता की आवाज उठाने और न्याय पाने का सबसे बड़ा साधन है।
जिस देश में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वह राष्ट्र कभी भी प्रगति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता।
रूढ़िवादिता और कुप्रथाओं का विरोध करना ही एक सच्चे और विवेकशील नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
भाषा और साहित्य का विकास तभी संभव है जब वह आम जनमानस की बोधगम्य और सरल शैली में हो।
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विवेक और बुद्धि की कसौटी पर जो विचार खरे न उतरें, उन्हें बिना किसी संकोच के त्याग देना चाहिए।
न्याय, समानता और स्वतंत्रता के बिना किसी भी सभ्य समाज की कल्पना करना पूरी तरह से असंभव है।
पाश्चात्य विज्ञान और आधुनिक शिक्षा को अपनाकर ही हमारा समाज वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ सकता है।
समाचार पत्र और स्वतंत्र प्रेस जनता की आवाज़ उठाने और समाज में वैचारिक क्रांति लाने का माध्यम हैं।
धर्म के नाम पर मनुष्य को बाँटने वाली हर दीवार को गिराकर मानवता के पुल का निर्माण करना आवश्यक है।
स्वतंत्र चिंतन और विवेकशील दृष्टि के बिना कोई भी समाज बौद्धिक रूप से जीवित नहीं रह सकता।
रूढ़िवादिता और पाखंड का विरोध करना ही हर जागरूक नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
पाश्चात्य विज्ञान और दर्शन का अध्ययन भारतीय ज्ञान परंपरा को अधिक समृद्ध बना सकता है।
भाषा और साहित्य का विकास समाज के वैचारिक उत्थान और चेतना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का खुलकर विरोध करना ही मानवता की सच्ची सेवा है।
प्रेस की स्वतंत्रता जनमानस को जागरूक करने और समाज सुधार का सबसे सशक्त माध्यम है।
अंधविश्वासों का त्याग और तार्किक दृष्टिकोण ही व्यक्ति को सच्चा इंसान बनाते हैं।
सामाजिक न्याय और समानता के बिना किसी भी राष्ट्र की सच्ची प्रगति संभव नहीं है।