
साहित्यकार
रामवृक्ष बेनीपुरी
1899–1968
रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के महान निबंधकार, गद्य-कार और क्रांतदर्शी पत्रकार थे। उन्हें "कलम का जादूगर" कहा जाता है क्योंकि उनकी भाषा में अद्वितीय ओज, प्रवाह और चित्रात्मकता थी।
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रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसंबर 1899 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ था। उन्होंने पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया और 'युवक', 'बालक', 'योगी' व 'जनता' जैसे कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे और अपने जीवन के कई वर्ष जेल में बिताए, जहाँ उन्होंने 'गेहूँ और गुलाब' जैसी प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं। उनके रेखाचित्र, संस्मरण और निबंध हिंदी साहित्य की अमूल्य थाती माने जाते हैं। उनका निधन 9 सितंबर 1968 को हुआ।
रामवृक्ष बेनीपुरी के अनमोल विचार
कलम का जादूगर कहे जाने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी ने हिंदी गद्य को एक नई ओजस्वी शैली प्रदान की।
उनका पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता को समर्पित एक खुली किताब था।
बेनीपुरी जी की शैली इतनी जीवंत थी कि पाठक को हर प्रसंग अपनी आँखों के सामने घटता प्रतीत होता था।
'गेहूँ और गुलाब' उनका अत्यंत प्रसिद्ध निबंध संग्रह है, जो कला और संस्कृति का अनूठा सुंदर समन्वय है।
वे केवल एक साहित्यकार नहीं बल्कि एक जुझारू स्वतंत्रता सेनानी और विद्रोही पत्रकार भी थे।
बेनीपुर गाँव की माटी से उपजा यह रचनाकार हिंदी साहित्य के क्षितिज पर सदा के लिए अमर हो गया।
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उनके रेखाचित्रों में समाज के उपेक्षित और साधारण लोगों की असाधारण कथाएँ जीवंत हो उठी हैं।
'माटी की मूरतें' उनके रेखाचित्रों का वह अद्भुत संग्रह है जो ग्रामीण भारत की सच्ची तस्वीर दिखाता है।
हिंदी पत्रकारिता में उनके द्वारा किए गए प्रयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्त्रोत रहे।
वे आज़ादी की लड़ाई के दौरान कई बार जेल गए और सलाखों के पीछे भी अपनी रचनात्मकता जारी रखी।
उनके निबंधों में राष्ट्रीय चेतना, समाज सुधार और मानवीय करुणा का स्वर बहुत प्रबल रूप से झलकता है।
'पतितों के देश में' उनका एक ऐसा चर्चित उपन्यास है जो समाज के हाशिए के लोगों की पीड़ा को उभारता है।
रामवृक्ष बेनीपुरी का गद्य अपनी भाषाई सरलता, मुहावरेदार प्रयोग और बेबाक अंदाज के लिए जाना जाता है।
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सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलना भले कठिन हो, पर अंततः विजय उसी की होती है।