
शायर-ए-इनक़िलाब
जोश मलीहाबादी
1898–1982
जोश मलीहाबादी (1898–1982) उर्दू के महान और क्रान्तिकारी शायर थे। उन्हें उनकी ओजपूर्ण शायरी और 'शायर-ए-इनक़िलाब' की उपाधि के लिए जाना जाता है।
27 अनमोल विचार · पूरी सूची →
जोश मलीहाबादी का जन्म 5 दिसंबर 1898 को उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद में एक प्रतिष्ठित साहित्यिक परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम शब्बीर हसन खान था और 'जोश' उनका तखल्लुस था। उन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया और जनमानस में स्वतंत्रता की अलख जगाई। वे अपनी बेबाकी, भाषा पर अद्भुत पकड़ और अनूठी शैली के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। भारत सरकार ने उन्हें 1954 में 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया, और बाद में वे पाकिस्तान चले गए जहाँ 1982 में उनका इंतकाल हुआ।
जोश मलीहाबादी के अनमोल विचार
विज्ञापन · Advertisement
विज्ञापन · Advertisement
शिकवा-ए-जुल्म-ए-सितमगर से न दिल को दो शिकस्त, इंकलाब-ए-सुब्ह का पैगाम है हर एक रात।
जो ज़िंदगी को समझते हैं इक नई तामीर, वो कभी मान नहीं सकते हैं किसी की ज़ंजीर।
हुस्न और इश्क़ की गहराई को पहचानो ज़रा, सिर्फ सूरत पे मिट जाना नहीं मक़्सूद-ए-वफ़ा।
दोस्ती का रिश्ता रूहों का मुकद्दस मेल है, जहाँ स्वार्थ की दीवार हो वो खेल बेमेल है।
तालीम वो हथियार है जो छीन ले अंधेरे, इसी रोशनी से सजते हैं मुस्तकबिल के सवेरे।
आंधियों के सामने झुकना हमारी ज़िद नहीं, हम वो चिराग हैं जो बुझना जानते ही नहीं।
सच के रास्ते पे चलने में जो तकलीफें हैं, वही तो इंसान की असल बड़ी ताक़तें हैं।
ज़ुल्म के साए में पलना अब गवारा नहीं, हर मज़लूम की आवाज़ है कि कोई सहारा नहीं।
अमीरी और गरीबी का ये फर्क मिटाना होगा, हर इक इंसान को जीने का हक दिलाना होगा।
सियासत के पुजारी सुन लें ये ऐलान-ए-अवाम, अब जुल्म के सहरे पर न होगा कोई भी सलाम।