होम › लेखक कोश › भगत सिंहक्रांतिकारी भगत सिंह 1907–1931
शहीद भगत सिंह (1907–1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर, समाजवादी और क्रांतिकारी नायक थे। उन्होंने अपने बौद्धिक और वैचारिक संघर्ष से स्वाधीनता आंदोलन को एक नई दिशा दी। 23 मार्च 1931 को लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें फाँसी दी गई।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को बंगा, लायलपुर (अब पाकिस्तान) में एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था। उन्होंने असहयोग आंदोलन के स्थगन के बाद मार्क्सवादी विचारधारा को अपनाया और नौजवान भारत सभा की स्थापना की। सांडर्स वध और असेंबली बम कांड के जरिए उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इंकलाब का संदेश दिया। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन और उनके लिखे पत्र भारतीय राजनीतिक दर्शन की अमूल्य थाती बने। उनका यह विश्वास था कि विचार और क्रांति कभी मरते नहीं, बल्कि वे समय के साथ और अधिक शक्तिशाली होते हैं।
भगत सिंह के अनमोल विचार प्रेमी, पागल और कवि एक ही चीज़ के बने होते हैं, और वह है - कल्पना!
बहरों को सुनने के लिए धमाके की बहुत आवश्यकता होती है।
मेरा धर्म तो केवल देश की सेवा करना है, इसके सिवाय और कुछ नहीं।
क्रांति मानव जाति का एक ऐसा अधिकार है जिसके लिए हर इंसान हकदार है।
व्यक्तियों को कुचला जा सकता है, लेकिन विचारों को नहीं दबाया जा सकता।
राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आज़ाद हूँ।
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ज़िंदगी तो अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।
आम तौर पर लोग जैसी चीजें हैं उसी के आदी हो जाते हैं और बदलाव के विचार से ही कांपने लगते हैं।
क्रांति से हमारा मतलब अत्याचार और अन्याय की इस व्यवस्था को पूरी तरह से बदलना है।
यदि जिंदा रहना है तो अपनी ताकत के बल पर जियो, दूसरों के रहमो-करम पर तो लाशें जिया करती हैं।
मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है, उससे मुझे फर्क पड़ता है।
बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार तो विचारों की सान पर तेज होती है।
मेरा विश्वास है कि एक समाजवादी समाज ही मनुष्य को शोषण और अन्याय से पूरी तरह मुक्त कर सकता है।
अहिंसा का बोलबाला तभी हो सकता है जब उसे बल प्रदान करने वाले हथियार मौजूद हों।
दिल से निकलने वाली हर आवाज़ बेअसर नहीं होती, उसे ज़माने को जगाना ही होता है।
कठोर नियम और आलोचना किसी भी क्रांतिकारी सोच के अनिवार्य अंग हैं।
आम आदमी की मुक्ति ही हर सच्चे संघर्ष का इकलौता और अंतिम लक्ष्य होनी चाहिए।
ईश्वरीय सत्ता में आँख मूँदकर विश्वास करना मनुष्य की बौद्धिक आज़ादी का हनन है।
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क्रांति महज़ खून-खराबा नहीं, बल्कि समाज के शोषक ढांचा को बदलने की पुकार है।
निष्ठावान युवा ही किसी राष्ट्र के भविष्य की दिशा और दशा तय करते हैं।
जो मनुष्य इस समाज को बदलता देखना चाहता है, उसे पहले खुद को बदलना होगा।
स्वार्थ और संकीर्णता से ऊपर उठे बिना हम एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकते।
जिंदगी अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।
प्रेम मनुष्य को कोमल बनाता है, किंतु देश के प्रति प्रेम उसे अटूट संकल्प देता है।
वे मुझे मार सकते हैं, मेरे विचारों को नहीं; वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, पर मेरी आत्मा को नहीं।
क्रांति कोई खूनी संघर्ष नहीं, बल्कि समाज की पुरानी सड़ चुकी व्यवस्था को बदलने की एक पवित्र सोच है।
ईश्वर या परलोक में विश्वास करने से मनुष्य अपनी कमजोरियों को छुपाने की कोशिश करता है।
निडरता और अन्याय के खिलाफ बगावत ही इंसान को एक सच्चा इंसान बनाती है।
सत्य की खोज और उसके लिए संघर्ष करना ही प्रत्येक प्रबुद्ध मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य है।
इंसान तभी कुछ महान कर सकता है जब वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचता है।
जो मनुष्य अन्याय सहकर चुप रहता है, वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ बहुत बड़ा पाप करता है।
वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति में स्वतंत्र रूप से सोचने और सवाल करने की हिम्मत पैदा करे।
समाज की सच्ची सेवा वही है जो शोषितों और पीड़ितों के जीवन में न्याय और समानता लेकर आए।
ढकोसलों और अंधविश्वासों से मुक्त समाज का निर्माण ही हमारे सपनों का असली भारत है।
कठिन समय में भी अपने आदर्शों से न डगमगाना ही सबसे बड़ी मानवीय सफलता है।
इनकी किताबें पढ़ें लिंक एफिलिएट हैं — आपके लिए कीमत वही रहती है।
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