
कथाकार
भीष्म साहनी
1915–2003
भीष्म साहनी (8 अगस्त 1915 – 11 जुलाई 2003) हिंदी के शीर्षस्थ कथाकार और उपन्यासकार थे। वे 'तमस' उपन्यास और मानवीय सरोकारों से जुड़ी कहानियों के लिए अमर हैं। प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच से उनका गहरा जुड़ाव रहा।
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भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। लाहौर से अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने अध्यापन किया और कुछ समय तक 'कम्युनिस्ट पार्टी' से भी जुड़े रहे। वे प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। उनका उपन्यास 'तमस' भारत-विभाजन की त्रासदी का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है। उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' और 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया था। उनकी कहानियों में आम आदमी का संघर्ष और साम्प्रदायिक सौहार्द की गहरी गूंज मिलती है।
भीष्म साहनी के अनमोल विचार
विभाजन की त्रासदी ने इंसानी रिश्तों को जो जख्म दिए, वे आज भी पूरी तरह भर नहीं पाए हैं।
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डर और पूर्वाग्रह समाज को अंदर से खोखला कर देते हैं, जैसा कि तमस में दिखाया गया है।
सांप्रदायिक दंगों के दौर में इंसानियत ही सबसे बड़ी कसौटी होती है, जिसे बचाए रखना हर नागरिक का कर्तव्य है।
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विभाजन ने सरहदों को तो खींच दिया, लेकिन दिलों के रिश्तों और साझा संस्कृति को पूरी तरह मिटाया नहीं जा सका।
डर और संकीर्णता मनुष्य को हिंसक बनाते हैं, जबकि प्रेम और समझदारी ही हमें इंसान बनाए रखते हैं।
मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियां और दिखावा व्यक्ति की सच्ची संवेदनाओं को धीरे-धीरे कुचल देते हैं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज बड़े युद्धों से ज्यादा भयंकर आम आदमी की रोज़मर्रा की अनकही लड़ाइयां होती हैं।
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि हमारी साझी तहज़ीब और आपसी भरोसे का सबसे बड़ा पुल है।
झूठ चाहे जितना ताकतवर और चमकदार लगे, अंततः जीत हमेशा साधारण और निष्कपट सच की ही होती है।
सत्ता और ताकत के नशे में चूर लोग हमेशा समाज के कमज़ोर तबके की आवाज़ को दबाने की कोशिश करते हैं।
सच्चा साहित्य वही है जो शोषित और पीड़ित मनुष्य के आंसुओं को पोंछने की कुव्वत रखता हो।
इंसान की पहचान उसके ओहदे या संपत्ति से नहीं, बल्कि संकट के समय उसके मानवीय फैसलों से होती है।
रूढ़ियों और अंधविश्वासों की बेड़ियां जब तक नहीं कटेंगी, समाज सच्ची प्रगति की राह पर नहीं चल सकता।
कला का असली मर्म यही है कि वह समाज के अंधेरे कोनों में उम्मीद की एक छोटी सी रोशनी जला सके।
आज़ादी का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब देश के हर आखिरी इंसान को न्याय और सम्मान मिलेगा।