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भारतेंदु हरिश्चंद्र
हिंदी के पितामह
भारतेंदु हरिश्चंद्र
1850–1885
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) आधुनिक हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के पितामह थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में देशप्रेम, समाज सुधार और भाषा के सहज रूप को स्थापित किया। उनके नाम पर ही हिंदी साहित्य के एक युग का नाम 'भारतेंदु युग' रखा गया है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। अल्पायु (मात्र 34 वर्ष) में ही उनका निधन 6 जनवरी 1885 को हो गया, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने हिंदी गद्य को एक नई दिशा दी। उन्होंने 'कवि वचन सुधा', 'हरिश्चंद्र मैगज़ीन' और 'बाला बोधिनी' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को साहित्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। नाटक, निबंध, कविता और पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन समाज की कुरीतियों पर करारा प्रहार किया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनमोल विचार
निज भाषा उन्नति है सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा-ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।