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सिदो-कान्हू
संथाल विद्रोह नायक
सिदो-कान्हू
1815–1856
सिदो और कान्हू मुर्मू 1855-56 के ऐतिहासिक संथाल हूल (विद्रोह) के महान नायक थे। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता, महाजनों और जमींदारों के शोषण के खिलाफ आदिवासियों को संगठित किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।
सिदो और कान्हू का जन्म झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में एक साधारण संथाल परिवार में हुआ था। ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों, दकुओं और महाजनों द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे अमानवीय अत्याचार से इनका मन विद्रोही हो उठा। जून 1855 में उन्होंने हजारों संथालों को इकट्ठा कर 'हूल' (विद्रोह) का शंखनाद किया। "करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो" का नारा देते हुए उन्होंने विदेशी शासन को हिला दिया। 1856 में अंग्रेजों द्वारा इन्हें फांसी दे दी गई, लेकिन इनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आदिवासी अस्मिता का अमर प्रतीक बन गया।
सिदो-कान्हू के अनमोल विचार
अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो, जल-जंगल-जमीन हमारी है और हम इसके मालिक हैं।