
कवयित्री
अमृता प्रीतम
1919–2005
अमृता प्रीतम बीसवीं सदी की एक महान और प्रख्यात पंजाबी तथा हिंदी कवयित्री थीं। उन्हें विभाजन की त्रासदी और नारी-वेदना की सबसे सशक्त आवाज़ माना जाता है। वह साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला थीं।
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अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उन्होंने पंजाबी और हिंदी साहित्य में उपन्यास, कविता और आत्मकथाएँ लिखकर अपनी अनूठी पहचान बनाई। उनकी प्रसिद्ध लंबी कविता "अज आखाँ वारिस शाह نู" देश के विभाजन के दर्द का अमर दस्तावेज बन गई। उन्हें भारतीय साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान के लिए 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' और 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। 31 अक्टूबर 2005 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी जीवित हैं।
अमृता प्रीतम के अनमोल विचार
मैं तैनू फिर मिलाँगा, कितिकर कित्थे पता नहीं
शायद तेरे माथे दी लटकन बन के मिलाँगा।
शायद तेरे माथे दी लटकन बन के मिलाँगा।
आज आखाँ वारिस शाह नूं, कितो कबरों बोल। और किताब-ए-इश्क दा कोई अग्ला वक्ता खोल।
एक सी वारिस शाह जिन्हाँ बोली थी पिच्छ, अज्ज लक्खां वारिस शाह तूं कह्रैं उत्थै विच्छ।
लोक आखदे ने वारिस शाह नूं, दिलों दा मीर। अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं, कितो कबरों बोल।
रसीदी टिकट मेरी आत्मकथा है, जिसमें मैंने अपने जीवन के पन्नों को बिना किसी पर्दे के खोला है।
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साहित्य वही है जो समाज के भीतर की बेचैनी को समझ सके और उसे पाठकों तक पहुँचा सके।
वक्त के समंदर में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो कभी डूबते नहीं, बस अमर हो जाते हैं।
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