
प्रधानमंत्री
लाल बहादुर शास्त्री
1904–1966
लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, जिनका कार्यकाल 1964 से 1966 तक रहा। उन्होंने सादगी, ईमानदारी और 'जय जवान जय किसान' के नारे से देश को प्रेरित किया।
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लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। वे महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के विचारों से गहरे प्रभावित थे। देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान देश का दृढ़ता से नेतृत्व किया। उन्होंने देश में खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए किसानों और सैनिकों के महत्व को सर्वोपरि रखा। 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका आकस्मिक निधन हो गया, लेकिन उनकी सादगी आज भी एक मिसाल है।
लाल बहादुर शास्त्री के अनमोल विचार
मेरी समझ से प्रशासन का मूल आधार यह होना चाहिए कि उसमें सच्चाई और ईमानदारी का पूरा समावेश हो।
हम अपने देश के लिए शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
कानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की नींव और अधिक मजबूत हो सके।
भ्रष्टाचार हमारे देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है, जिसे जड़ से उखाड़ फेंकना अनिवार्य है।
देश की आज़ादी की रक्षा करना केवल सैनिकों का नहीं, बल्कि हर नागरिक का पवित्र कर्तव्य है।
कठिन समय में घबराने के बजाय हमें और अधिक साहस और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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श्रम ही असली पूजा है, और देश का किसान तथा मजदूर ही राष्ट्र की असली ताकत हैं।
जब देश पर संकट आता है, तो व्यक्तिगत स्वार्थों को भुलाकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए।
हमें अपने देश के संसाधनों का उपयोग बहुत ही सावधानी और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।
गरीबों और वंचितों के उत्थान के बिना किसी भी देश का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
ताशकंद समझौते के समय उन्होंने देश के सम्मान और हितों से कभी कोई समझौता नहीं किया।
सादा जीवन और उच्च विचार का सिद्धांत उनके पूरे जीवन और कार्यशैली में स्पष्ट रूप से झलकता था।
देश की जनता ने उनके आह्वान पर एक समय स्वेच्छा से सप्ताह में एक दिन उपवास रखना स्वीकार किया था।
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जय जवान, जय किसान का यह नारा देश के स्वाभिमान और श्रम की सच्ची पहचान है।
मेहनत ऐसी खामोशी से करो कि तुम्हारी सफलता ही तुम्हारा सबसे बड़ा परिचय बन जाए।
आर्थिक आज़ादी और सामाजिक न्याय के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
देश की सेवा में कठिनाइयाँ तो आती हैं, पर दृढ़ इच्छाशक्ति से हर बाधा पार होती है।
सादगी और उच्च विचार ही एक सच्चे लोक सेवक और इंसान की असली पूंजी होते हैं।
सत्ता का उपयोग विशेषाधिकार के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा के लिए है।
यदि हमारे देश में एक भी व्यक्ति भूखा सोता है, तो यह हमारे लोकतंत्र की विफलता है।
अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करना ही राष्ट्रभक्ति का सबसे उत्तम मार्ग है।
सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही हम समाज में स्थाई शांति स्थापित कर सकते हैं।
युवा पीढ़ी को देश के भविष्य निर्माण के लिए शिक्षा और नैतिकता को अपनाना होगा।
हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि देशहित व्यक्तिगत हित से हमेशा ऊपर होता है।