
संत कवि
संत रविदास
1450–1520
संत रविदास (रैदास) भक्तन काल के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका जन्म काशी में हुआ था और वे रामानंद के शिष्यों में गिने जाते हैं। उनकी वाणियों में समतामूलक समाज और सच्चे भक्ति भाव का संदेश मिलता है।
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संत रविदास का जन्म 1450 ईसवी के आसपास वाराणसी (काशी) के सीर गोवर्धनपुर में हुआ था। वे चर्मकार परिवार से थे और जीवनभर अपना पारंपरिक कार्य करते हुए भगवद्भक्ति में लीन रहे। उनकी सीधी-सरल भाषा और पदों ने तत्कालीन समाज में व्याप्त जात-पात और छुआछूत का कड़ा विरोध किया। वे मीराबाई के गुरु भी माने जाते हैं और उनकी 40 वाणियाँ सिख ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी संकलित हैं। उनके अनुयायी उन्हें 'रैदास' के रूप में भी पूजते हैं और उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है।
संत रविदास के अनमोल विचार
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ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोट-बड़ों सब सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न।
ऐसा चाहूँ राज़ मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ों सब सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न॥
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मेहत कर कमाइ खाए, जो श्रम कर जीवन बिताए। ताके पद रज मस्तक धारौं, रैदास शीश झुकाए॥
प्रेम न बाड़े बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जो कोइ रुचि, प्रेम हाट लइ जाय॥
माया मिली न राम मिल्या, मन भटक्यो संसार। भक्ति बिना प्राणी फिरे, ज्यों जल बिन मछवार॥
ज्ञान बिना प्राणी अंधेरा, भटकत फिरे चहुंओर। संत संग करि जो सुधि पावै, मिटै जनम की टोर॥
तन की मलीनता जल धोवै, मन मलीन कैसे धोइ। राम नाम सुधि मन में राखै, निर्मल होय सब कोइ॥
सहज प्रेम सोई प्रभु पावै, कपट न टिकै द्वार। रैदास कहे सतसंग महिं, उतरे भवजल पार॥
अपना जीवन सार्थक कर ले, जो प्रभु चरनन चित लाए। भवसागर से तरि जाई वो, जो नाम निरंतर गाए॥
जगत जंजाल में फँस कर मूरख, अपना जनम गँवावै। अंत समय पछिताना होई, जब यमराज डरावै॥
उत्तम खेती मध्यम बान, निंद चाकरी भीख निदान। संत कहें यह नीति हमारी, धरम बिना सब काज बिगारी॥
संतोष धन सबसे बड़ा धन, जाके उर संतोष। ताके मन दुख व्यापै नाहीं, मिटै सकल असंतोष॥
करम प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करै सो तस फल चाखा। संत रैदास कहें यह साची, झूठ न कोऊ भाषा॥