होम › लेखक कोश › सावित्रीबाई फुलेसमाज सुधारक सावित्रीबाई फुले 1831–1897
सावित्रीबाई फुले (1831–1897) भारत की पहली महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारक और कवयित्री थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे में देश का पहला बालिकाओं का विद्यालय शुरू किया था।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के नायगाव में हुआ था। उनका विवाह 1840 में ज्योतिराव फुले के साथ हुआ, जिन्होंने उनकी शिक्षा का बीड़ा उठाया। उन्होंने दलितों, महिलाओं और शोषितों के अधिकारों के लिए कड़ा संघर्ष किया तथा 'सत्यशोधक समाज' के माध्यम से समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का विरोध किया। वे मराठी की एक प्रसिद्ध कवयित्री थीं और उनके काव्य संग्रह 'भवकशी सुबोध रत्नाकर' तथा 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर' काफी प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 1897 में पुणे में फैले प्लेग के मरीजों की सेवा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
सावित्रीबाई फुले के अनमोल विचार विद्या ही मनुष्य को इंसान बनाती है, ज्ञान के बिना जीवन व्यर्थ है।
शिक्षा वह हथियार है जिससे समाज की हर बेड़ी को तोड़ा जा सकता है।
महिलाओं का शिक्षित होना राष्ट्र के उत्थान के लिए सबसे पहली शर्त है।
अज्ञानता और अंधविश्वास समाज के सबसे बड़े और भयंकर शत्रु हैं।
सत्य की खोज और मानवता की सेवा ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
जो लोग सवाल नहीं पूछते, वे कभी अपनी स्थिति नहीं बदल सकते।
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पढ़ना-लिखنا केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच के लिए है।
छुआछूत और जात-पात जैसी कुरीतियां मानवता के माथे पर कलंक हैं।
समाज में बदलाव लाने के लिए खुद को पहले त्याग के मार्ग पर चलना होगा।
दीन-दुखियों और शोषितों की सेवा करना ही सबसे बड़ी ईश्वर भक्ति है।
डरकर जीने से बेहतर है कि अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए जिया जाए।
बेटियों को पढ़ाना यानी आने वाली पूरी पीढ़ी को सशक्त और ज्ञानी बनाना।
बिना शिक्षा के बुद्धि का विकास नहीं होता, बुद्धि के बिना मनुष्य का विवेक मर जाता है और विवेकहीन व्यक्ति पशु समान हो जाता है।
संघर्ष के मार्ग पर चलने वाले ही इतिहास रचते हैं, जो कठिनाइयों से डरते हैं वे केवल भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
समाज में फैले पाखंड और झूठे रिवाजों को तोड़ने के लिए तर्क की कसौटी पर हर परंपरा को कसना अनिवार्य है।
स्त्री और शूद्रों की शिक्षा पर रोक लगाने वाली व्यवस्था को उखाड़ फेंकना ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिए।
कठिनाइयां और सामाजिक विरोध इंसान के हौसले को और अधिक मजबूत बनाते हैं, रुकना कभी भी विकल्प नहीं होता।
सच्ची मित्रता वही है जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने में आपका साथ दे और आपको सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।
समय किसी के लिए नहीं रुकता, इसलिए हर पल का उपयोग समाज के उत्थान और गरीबों की सेवा में करना चाहिए।
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प्रेम और करुणा के बिना कोई भी समाज मानवीय नहीं बन सकता, हर प्राणी के प्रति दया भाव रखना ही सच्ची इंसानियत है।
ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से किया गया कठिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता, उसका परिणाम समाज को दिशा देता है।
जात-पात और छुआछूत की दीवारें इंसानों को बांटती हैं, इन्हें गिराकर समतावादी समाज की स्थापना ही सच्चा न्याय है।
जो लोग अन्याय सहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते, वे खुद अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को बढ़ावा देते हैं।
खुद को जोखिम में डालकर भी दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना ही एक सच्चे और जागरूक नागरिक का परम कर्तव्य है।
शिक्षा ही वह चाबी है जो गुलामी के ताले को खोलकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
जो स्त्री पढ़ना-लिखना सीख जाती है, वह अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवार देती है।
संघर्ष के मार्ग पर चलने वाले लोग ही इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अमर करते हैं।
सत्य की राह पर चलना कठिन जरूर है, लेकिन अंततः विजय उसी की होती है।
समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वासों के खिलाफ खड़ा होना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है।
बिना ज्ञान के मनुष्य पशु के समान है, इसलिए पढ़ना और सिखाना हमारा पहला कर्तव्य है।
हर इंसान को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए, चुप रहना अन्याय का साथ देना है।
सेवा और त्याग से ही समाज में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
जो लोग दूसरों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनका जीवन ही सार्थक होता है।
न्याय और समानता के बिना किसी भी समाज का विकास अधूरा और अधूरा ही रहता है।
कठिनाइयां रास्ते का कांटा हैं, उन्हें अपनी मंजिल का रोड़ा मत बनने दो।
जाति और धर्म के भेदभाव को मिटाकर मानवता को ही अपना एकमात्र धर्म मानो।
इनकी किताबें पढ़ें लिंक एफिलिएट हैं — आपके लिए कीमत वही रहती है।
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