
किसान नेता
स्वामी सहजानंद सरस्वती
1889–1950
स्वामी सहजानंद सरस्वती (1889–1950) आधुनिक भारत के महान किसान नेता, स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी विचारक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शोषित किसानों के अधिकारों और जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए समर्पित कर दिया।
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स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 22 फरवरी 1889 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था। उन्होंने संन्यास दीक्षा लेने के बाद बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाया और किसानों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने 1929 में 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की। वे एक महान विद्वान, ओजस्वी वक्ता और लेखक थे जिन्होंने किसानों के दर्द को साहित्य और राजनीतिक मंचों पर प्रमुखता से रखा। उनका निधन 26 जून 1950 को हुआ।
स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनमोल विचार
किसान ही इस देश की रीढ़ हैं और उन्हीं के परिश्रम पर पूरा समाज टिका हुआ है।
जमींदारी प्रथा मानवता के माथे पर एक कलंक है जिसे जड़ से उखाड़ फेंकना अनिवार्य है।
जो अन्न उपजाता है, आज वही दाने-दाने को मोहताज है, यह व्यवस्था का सबसे बड़ा पाप है।
क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना है।
मेहनत करने वाले को उसका हक मिलना ही चाहिए, यही सच्चा धर्म और समाजवाद है।
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हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध है।
किसानों की एकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, इसे कोई नहीं तोड़ सकता।
जब तक खेत पर किसान का अधिकार नहीं होगा, तब तक देश वास्तविक रूप से स्वतंत्र नहीं माना जाएगा।
डर और गुलामी की मानसिकता को छोड़कर ही किसान अपने अधिकारों को पा सकता है।
हमारा लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना है जहाँ कोई भूखा न सोए और किसी का शोषण न हो।
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कैसे लोगे मालगुजारी, लठ हमारा जिंदाबाद! अन्याय के खिलाफ संघर्ष ही सच्चा धर्म है।
भूखे पेट ईश्वर की भक्ति नहीं होती, पीड़ित किसान को रोटी दिलाना ही असली पूजा है।
पसीना बहाने वाला किसान ही सच्चा समाज निर्माता है, शोषक परजीवियों का कोई हक नहीं।
डरो मत, संगठित हो जाओ; अत्याचार सहना भी अत्याचारी का साथ देने जैसा पाप है।
किसानों और मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने वाली चेतना ही सच्ची शिक्षा है।
संन्यास का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि पीड़ित जनता की सेवा में समर्पित हो जाना है।
खेत की मिट्टी में पसीना बहाना किसी मंदिर में पूजा करने से कहीं अधिक पवित्र है।
अधिकार मांगने से नहीं छीनने से मिलते हैं, अब हाथ जोड़ने का नहीं संघर्ष का समय है।
जब तक शोषक और शोषित का भेद समाप्त नहीं होता, हमारी क्रांति पूरी नहीं हो सकती।
सच्चा साधु वही है जो अन्याय के सामने सिर न झुकाए और सत्य के लिए संघर्ष करे।
दुनिया को अन्न देने वाला किसान किसी की दया का नहीं, अपने अधिकार का हकदार है।
खेत-खलिहान में पसीना बहाने वाले सभी मजदूर और किसान भाई हैं, उनमें कोई भेद नहीं।
हमारी सफलता केवल व्यवस्था बदलने में नहीं, बल्कि किसान के सम्मान की बहाली में है।