
दिल की उम्मीदों का मौसम अब सुहाना हो गया, वतन
की राह में कुर्बान होना नजराना हो गया।
— अशफ़ाक़उल्ला ख़ान
अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ान की यह पंक्तियाँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस अद्वितीय जज़्बे को बयां करती हैं, जहाँ देश की आज़ादी के लिए जान न्यौछावर करना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक गर्व और सौभाग्य बन गया था। इन पंक्तियों में कवि का मिजाज गहरी देशभक्ति, अदम्य साहस और प्रेम का एक ऐसा अनूठा संगम है, जहाँ मातृभूमि के प्रति समर्पण ही जीवन का सबसे बड़ा उत्सव बन जाता है। फाँसी के फंदे को गले लगाते समय भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि यह विश्वास था कि उनका यह बलिदान देशवासियों के दिलों में स्वतंत्रता की अलख जगाएगा। उनके लिए वतन की राह का हर काँटा एक फूल की तरह था, और मौत को गले लगाना किसी खूबसूरत मौसम के आने जैसा पावन अनुभव था।
आज के संदर्भ में इन पंक्तियों का अर्थ केवल ऐतिहासिक न रहकर अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है। आज जब समाज में स्वार्थ, उदासीनता और व्यक्तिगत लाभ की भावना बढ़ रही है, तब अशफ़ाक़उल्ला ख़ान का यह काव्य हमें सिखाता है कि राष्ट्र और समाज के प्रति हमारी भी कुछ नैतिक जिम्मेदारियाँ हैं। “कुर्बान होना नजराना हो गया” केवल शहादत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर उस नागरिक के लिए प्रेरणा है जो ईमानदारी, सच्चाई और देशहित के लिए अपने छोटे-छोटे स्वार्थों का त्याग करता है। यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि देश सेवा कोई बोझ नहीं, बल्कि एक ऐसा पवित्र कर्तव्य है जिसे हर नागरिक को गर्व और खुशी के साथ निभाना चाहिए।
अशफ़ाक़उल्ला ख़ान की चुनी हुई पंक्तियाँ
अशफ़ाक़उल्ला ख़ान के बारे में
अशफ़ाक़उल्ला ख़ान (22 अक्टूबर 1900 – 19 दिसंबर 1927) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी और कवि थे। वे रामप्रसाद 'बिस्मिल' के घनिष्ठ मित्र और काकोरी कांड के प्रमुख नायकों में से एक थे। देश की आज़ादी के लिए हँसते-हँसते फाँसी पर झूलने वाले वे अमर शहीद थे। पूरा परिचय और सभी विचार: अशफ़ाक़उल्ला ख़ान — लेखक कोश।
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