
कला और साहित्य के लिए यह जरूरी है कि वे समाज के
यथार्थ से आँखें न चुराएं बल्कि उसका सामना करें।
— महाश्वेता देवी
प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी की यह पंक्ति साहित्य और कला के मूल उद्देश्य को रेखांकित करती है। यह विचार स्पष्ट करता है कि कला केवल मनोरंजन या कोरी कल्पनाओं का साधन नहीं है
महाश्वेता देवी की चुनी हुई पंक्तियाँ
आदिवासी जंगल सिर्फ ज़मीन नहीं, उनकी अस्मिता और जीवन जीने का अधिकार हैं।
समाज में बदलाव भाषणों से नहीं, बल्कि ज़मीन पर किए गए संघर्षों और त्याग से आता है।
भूख और अपमान से बड़ा कोई पाप नहीं है, और इसे मिटाना ही सबसे बड़ा धर्म है।
जब तक समाज में असमानता और अन्याय रहेगा, मेरी लेखनी और सक्रियता कभी विश्राम नहीं लेगी।
सत्ता जब जनता के अधिकारों को छीने, तब प्रतिरोध करना हर नागरिक का पहला कर्तव्य है।
साहित्य वही सच्चा है जो समाज के सबसे अंतिम और शोषित व्यक्ति के आँसू पोछ सके।
मेहनतकशों के पसीने की बूंदों से ही इस देश की असल नींव मजबूत होती है।
महाश्वेता देवी के बारे में
महाश्वेता देवी (1926–2016) एक प्रख्यात बांग्ला लेखिका, उपन्यासकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता थीं। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से देश के शोषित, वंचित और आदिवासी समुदायों की पीड़ा को मुखर स्वर दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: महाश्वेता देवी — लेखक कोश।
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