
सच्चा प्रेम स्वार्थ की सीमाओं को तोड़कर
आत्मा को मुक्त कर देता है।
— मौलाना आज़ाद
भारत के पहले शिक्षा मंत्री और महान विचारक मौलाना अबुल कलाम आजाद की यह पंक्ति प्रेम के सबसे पवित्र और दार्शनिक रूप को परिभाषित करती है। उनके अनुसार, सच्चा प्रेम किसी प्रकार के स्वार्थ, मोह या बंधन में नहीं बंधा होता, बल्कि यह स्वार्थ की संकीर्ण दीवारों को गिराकर इंसान की आत्मा को पूरी तरह से स्वतंत्र कर देता है। मौलाना आज़ाद का मिजाज एक ऐसे मानवतावादी और रूहानी शायर का था, जिनके लिए प्रेम केवल दो इंसानों का आकर्षण नहीं, बल्कि पूरी कायनात और ईश्वर के प्रति अगाध समर्पण था। उनकी शायरी और गद्य में इंसानियत, रूहानी गहराई और आज़ादी की तड़प साफ झलकती है, जो उनके विद्रोही और उदारवादी व्यक्तित्व को दर्शाती है।
आज के भौतिकवादी और स्वार्थी युग में मौलाना आज़ाद की यह बात और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज जहाँ रिश्तों में लेन-देन, दिखावा और अपेक्षाओं का बोझ बढ़ गया है, वहीं यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि प्रेम का असली मतलब पाना नहीं, बल्कि मुक्त करना और selfless होना है। जब हम किसी से बिना किसी शर्त के प्रेम करते हैं, तो हमारे मन की ईर्ष्या, नफरत और छोटे-камеपन स्वतः समाप्त हो जाते हैं, जिससे आंतरिक शांति और सच्ची मानसिक आज़ादी मिलती है।
मौलाना आज़ाद की चुनी हुई पंक्तियाँ
मौलाना आज़ाद के बारे में
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888–1958) स्वतंत्रता सेनानी, महान विद्वान और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। वे उर्दू पत्रकारिता और भारतीय राष्ट्रवाद के अग्रणी स्तंभ थे, जिनका जन्मदिन 'राष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। पूरा परिचय और सभी विचार: मौलाना आज़ाद — लेखक कोश।
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