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12 Sep 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
मिर्ज़ा ग़ालिब: ग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो ‘ग़ालिब’ तो क
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

ग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो 'ग़ालिब' तो कह डालूँ

कि हर इक शे'र में मेरे लहू का एक क़तरा है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब की यह मशहूर पंक्ति उनकी शायरी के पीछे छिपी गहरी और दर्दनाक सच्चाई को बयां करती है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि ग़ज़ल कहना या कविता लिखना उनके लिए कोई आसान काम या मनोरंजन नहीं है। ग़ालिब कहते हैं कि अगर शायरी करना उनके बस की बात होती, तो वे बहुत आसानी से सब कुछ कह डालते। लेकिन असलियत यह है कि उनके हर एक शेर (पंक्ति) को बनाने में उनके दिल का खून और उनकी जिंदगी का असली दर्द शामिल है। यहाँ ‘लहू का एक कतरा’ इस बात का प्रतीक है कि उनकी हर रचना उनकी अपनी भावनाओं, टूटे हुए सपनों, तन्हाइयों और अनगिनत इंसानी एहसासों की निचोड़ है। इस पंक्ति से ग़ालिब का मिजाज एक ऐसे संवेदनशील और गंभीर कलाकार का नजर आता है जो अपनी कला के प्रति पूरी तरह ईमानदार है और रचनाकर्म को अपनी रूह का हिस्सा मानता है।

आज के इस आधुनिक और भागदौड़ भरे दौर में भी ग़ालिब की यह बात उतनी ही सच और प्रासंगिक है। आज जब सोशल मीडिया और मनोरंजन की दुनिया में शब्दों को बहुत आसानी से और सतही तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तब ग़ालिब की यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि कोई भी सच्ची और असरदार रचना बिना गहराई और आत्मिक जुड़ाव के संभव नहीं है। यह आज के लेखकों, कलाकारों और विचारकों को यह सीख देती है कि जब तक किसी कला में व्यक्ति की अपनी सच्ची भावना और अनुभव नहीं जुड़ते, तब तक वह दिल को छूने में नाकाम रहती है। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन के गहरे अनुभवों और संघर्षों से ही सच्चे और अमर साहित्य का जन्म होता है, जो पीढ़ियों तक इंसानी दिलों को झकझोरता रहता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब की चुनी हुई पंक्तियाँ

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है मिरे आक़ा 'ग़ालिब'
कि ये वो आग है जो लगाए न लगे और बुझाए न बने
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्स्र नहीं इन्साँ होना
उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा
धूल चेहरे पर थी और आइना साफ़ करता रहा
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइए 'असद'
आलिम है इस किताब का हर वर्क़ सफ़ेद
आते हैं ग़ैब से ये मज़ाीम खयाल में
'ग़ालिब' सहीफ़ा-ए-आसमाँ और है मिरा
न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
दिल ही तो है न سنگ و خشت दर्द से भर न आए क्यों
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों

मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में

मिर्ज़ा असदुल्लाह खान 'ग़ालिब' (1797-1869) उर्दू और फ़ारसी के महानतम शायर थे। उन्होंने दिल्ली के मुग़ल दरबार में सेवा दी और अपनी जटिल, दार्शनिक और रूमानी शायरी से उर्दू अदब को अमर कर दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: मिर्ज़ा ग़ालिब — लेखक कोश

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लेखकawaraalfaz

वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 12 September 2026 · अपडेट: 12 September 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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