
रहिमन ओछे नरन ते, बैर भलो ना नाइ। छाँड़े
ड़े काटै क्यौं भलो, काटे चाटे काइ॥
— रहीम ख़ानेख़ाना
रहीम ख़ानेख़ाना की यह पंक्ति नीच और ओछी मानसिकता वाले लोगों से दूर रहने की व्यावहारिक सलाह देती है। रहीम कहते हैं कि ऐसे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न ही दोस्ती। वे कुत्ते के उदाहरण से समझा
रहीम ख़ानेख़ाना की चुनी हुई पंक्तियाँ
बिगाड़ें बात बने नहीं, लाख करो किन कोइ। रहीमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
धीरज धरिए समय कै, देखि दिनन को फेर। जब नीकें दिन आवत हैं, बनत न लागत देर॥
प्रीति कठिन है प्रेम की, मूँड़ कटाए बोल। कहि रहीम ते उबरै, जो रस सके न तोल॥
बड़ेन को लघु बोलिबे, नहिं रहीम घटि जाय। गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं॥
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवे सुई, का करे तरवारि॥
जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़े लोग। कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मितावन जोग॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
रहीम ख़ानेख़ाना के बारे में
रहीम ख़ानेख़ाना मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध कवि, सेनापति और प्रशासक थे। उनका पूरा नाम अब्दुल रहीम खान-ए-खाना था और वे अकबर के नवरत्नों में शामिल थे। वे हिंदी भक्ति काव्य और नीतिपरक दोहों के लिए अमर हैं। पूरा परिचय और सभी विचार: रहीम ख़ानेख़ाना — लेखक कोश।
विज्ञापन · Advertisement
ये भी पढ़ें
काव्यअल्लामा इक़बाल: न पूछ इन मदरसा-वालों से मक़्सूद-ए-सबक़ क्यन पूछ इन मदरसा-वालों से मक़्सूद-ए-सबक़ क्या है, ये बेचारे तो इल्म-ए-बे-हुनर की जुस्तजू में हैं। — अल्लामा इक़बाल18 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यसुमित्रानंदन पंत: सत्य अహిंसा का आलोक, भर दे जग में नया विश्सत्य अహిंसा का आलोक, भर दे जग में नया विश्वास, मिटे दूर हो सारे शोक, हो सबका हित का प्रकाश। — सुमित्रानंदन…14 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यरसखान: मूँड़ मुँड़ाये हरि मिलैं, तो सब कोई मुँड़ामूँड़ मुँड़ाये हरि मिलैं, तो सब कोई मुँड़ाय। बार-बार मुँड़न फिरे, बार-बार बढ़ जाय। — रसखान25 Oct 2026 पढ़ें →
काव्यमीराबाई: हरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदीहरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदी की लाज राखी, आप बढ़ायो चीर। — मीराबाई19 Sep 2026 पढ़ें →