
रे बटकल! जीवन की दो राहों
में, कभी न रुकना चाहिए
— रामधारी सिंह दिनकर
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह पंक्ति मनुष्य को जीवन के हर मुश्किल मोड़ पर निरंतर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। ‘दो राहों’ का अर्थ है वे स्थितियां जहाँ व्यक्ति के सामने असमंजस होता है कि वह किस दिशा में जाए। दिनकर जी का मिजाज हमेशा ओज, क्रांति, संघर्ष और पुरुषार्थ का रहा है। वे भाग्य के भरोसे बैठने या निराशा में डूबने के बजाय कर्मठता को सर्वोपरि मानते हैं। उनकी यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि जीवन में चाहे कितनी भी दुविधाएँ या बाधाएँ क्यों न आएं, रुकना या ठहर जाना कायरता है। कवि का स्वर यहाँ एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह हमें यह सिखाता है कि जीवन गतिशीलता का नाम है और निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।
आज के इस तेज-तर्रार और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दौर में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। वर्तमान समय में करियर, रिश्तों और मानसिक तनाव के स्तर पर हर व्यक्ति कभी-कभार ऐसे ही दोराहे पर खड़ा खुद को पाता है, जहाँ असफलता का डर उसे रोक लेना चाहता है। ऐसे में दिनकर का यह संदेश युवाओं को प्रेरित करता है कि वे हार मानने के बजाय निर्णय लें और आगे बढ़ें। आज के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि ठहराव या निराशा से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलता, बल्कि निरंतर प्रयास और संघर्ष से ही जीवन को सही दिशा दी जा सकती है।
रामधारी सिंह दिनकर की चुनी हुई पंक्तियाँ
रामधारी सिंह दिनकर के बारे में
रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक हिंदी साहित्य के महानतम कवियों में से एक थे। उन्हें उनकी ओजस्वी रचनाओं के लिए "राष्ट्रकवि" के रूप में सम्मानित किया गया। उनकी वाणी में क्रान्ति, ओज और प्रेम का अनूठा संगम देखने को मिलता है। पूरा परिचय और सभी विचार: रामधारी सिंह दिनकर — लेखक कोश।
ये भी पढ़ें
काव्यसंत रविदास: प्रभु जी तुम मोती हम धागा,प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनही मिलत सुहागा। — संत रविदास29 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यअज्ञेय: जो नहीं हो सका पूर्ण, उसे भी पूर्ण समझो;जो नहीं हो सका पूर्ण, उसे भी पूर्ण समझो; अधूरापन ही तो जीवन का सौंदर्य है। — अज्ञेय18 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यभगत सिंह: कठोर नियम और आलोचना किसी भी क्रांतिकारीकठोर नियम और आलोचना किसी भी क्रांतिकारी सोच के अनिवार्य अंग हैं। — भगत सिंह24 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यसुमित्रानंदन पंत: सत्य अహిंसा का आलोक, भर दे जग में नया विश्सत्य अహిंसा का आलोक, भर दे जग में नया विश्वास, मिटे दूर हो सारे शोक, हो सबका हित का प्रकाश। — सुमित्रानंदन…14 Sep 2026 पढ़ें →