
जो लोग इतिहास की धारा को मोड़ना
चाहते हैं, वे खुद बह जाते हैं।
— हजारीप्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के एक महान निबंधकार, उपन्यासकार और सांस्कृतिक मर्मज्ञ थे। उनकी यह पंक्ति इस अकाट्य सत्य को उजागर करती है कि काल या समय की निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा और मानवीय इतिहास के स्वाभाविक विकास को कोई भी व्यक्ति अपने बल पर नहीं बदल सकता। जो लोग अपनी जिद या अहंकार में इतिहास के प्रवाह को बलपूर्वक मोड़ने का दुस्साहस करते हैं, वे स्वयं ही इतिहास के थपेड़ों में नष्ट हो जाते हैं। द्विवेदी जी का मिजाज हमेशा से परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने वाला, गहन मानवतावादी और विवेकशील रहा है। वे अतीत की रूढ़ियों के अंधे समर्थक नहीं थे, न ही वर्तमान की अंधी नकल के पक्षधर थे, बल्कि वे इतिहास की गति को समझकर समाज को सही दिशा देने में विश्वास रखते थे।
आज के समय में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। वर्तमान युग में जब कुछ लोग, सत्ताएँ या विचारधाराएँ अपनी संकीर्ण राजनीति, झूठे प्रोपेगेंडा या बल के प्रयोग से समाज के स्वाभाविक विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को उलटना चाहती हैं, तब यह कथन चेतावनी देता है कि समय की गति सर्वशक्तिमान है। इतिहास अंततः न्याय और सत्य के पक्ष में ही बहता है। आज के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि हमें समय के बदलाव को समझकर उसके साथ चलना चाहिए, न कि प्रकृति और इतिहास के नियमों के विरुद्ध जाकर तानाशाही या दमन का रास्ता अपनाना चाहिए। जो लोग समय के रथ को रोकने का प्रयास करते हैं, उन्हें अंततः पतन का ही सामना करना पड़ता है।
हजारीप्रसाद द्विवेदी की चुनी हुई पंक्तियाँ
हजारीप्रसाद द्विवेदी के बारे में
हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी के शीर्षस्थ निबंधकार, उपन्यासकार और आलोचक थे। उनका जन्म 1907 में बलिया में हुआ था और 1979 में उनका निधन हुआ। उन्होंने अपनी गहरी सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक दृष्टि से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। पूरा परिचय और सभी विचार: हजारीप्रसाद द्विवेदी — लेखक कोश।
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