
दोनों हाथ जिसे दिखलाते हैं सूनापन, वे
दोनों हाथ समर्पित हैं तुझको हे जीवन!
— हरिवंश राय बच्चन
हरिवंश राय बच्चन की यह अत्यंत मर्मस्पर्शी पंक्ति मनुष्य की मूल अकेलेपन और उसके बावजूद जीवन के प्रति अगाध समर्पण को बयां करती है। जब कवि कहता है कि दोनों हाथ सूनापन दिखाते हैं, तो वह जीवन की रिक्तता, असफलताओं और अंततः मृत्यु सत्य की ओर संकेत करता है। इन पंक्तियों में बच्चन साहब का मिजाज स्पष्ट झलकता है, जो विरह और निराशा के बीच भी जीवन से भागते नहीं, बल्कि उसकी संपूर्ण जटिलता को खुले हाथों से गले लगाते हैं। उनकी यह स्वीकारोक्ति पलायनवाद के बिल्कुल विपरीत है; यह एक जुझारू और संवेदनशील मन का परिचायक है जो अभावों में भी जीवन का उत्सव मनाना जानता है और अपनी संपूर्णता में उसे स्वीकार करता है।
आज के इस आधुनिक और अति-व्यस्त दौर में, जहाँ इंसान भौतिकता की अंधी दौड़ में भीतर से अकेला और रिक्त महसूस करता है, यह पंक्ति एक गहरा दार्शनिक संदेश देती है। आज का मनुष्य सोशल मीडिया की चमक-दमक के पीछे अपनी मानसिक अकेलेपन को छिपाने की कोशिश करता है, जबकि बच्चन का यह काव्य हमें सिखाता है कि हम अपने खालीपन और कमजोरियों को स्वीकार करें। यह हमें प्रेरणा देता है कि हम जीवन से कोई शिकायत न करें, बल्कि इसके संघर्षों और सूनेपन को भी अपनाते हुए पूरी शिद्दत से जिएँ। यह समर्पण वस्तुतः जीवन के प्रति एक अटूट प्रेम और उसकी यथार्थता को बिना किसी शर्त के स्वीकार करने का साहस है।
हरिवंश राय बच्चन की चुनी हुई पंक्तियाँ
'बापू की कुटिया' कह लेता है उसको मतवाला!
हरिवंश राय बच्चन के बारे में
हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रख्यात और लोकप्रिय कवि थे। वे 'हालावाद' के प्रवर्तक और अपनी प्रसिद्ध रचना 'मधुशाला' के लिए अमर हो गए। उन्हें उनकी आत्मकथा और पद्म भूषण सम्मान के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। पूरा परिचय और सभी विचार: हरिवंश राय बच्चन — लेखक कोश।
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