
भूखे पेट ईश्वर की भक्ति नहीं होती, पीड़ित
किसान को रोटी दिलाना ही असली पूजा है।
— स्वामी सहजानंद सरस्वती
स्वामी सहजानंद सरस्वती की यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि बुनियादी ज़रूरतों, विशेषकर भोजन के बिना धर्म और भक्ति का कोई अर्थ नहीं रह जाता। वे कर्म को ही सच्चा धर्म मानते थे। उनका मिजाज एक क्रांतिकारी चेतना और व्यावहारिक सोच से भरा था, जहाँ वे कोरी आध्यात्मिकता के स्थान पर सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। उनके अनुसार, पूजा-पाठ से अधिक पवित्र काम उस अन्नदाता किसान के पेट की भूख मिटाना है, जो पूरे देश का पोषण करता है।
आज के संदर्भ में यह विचार और भी अधिक प्रासंगिक है, जब किसान आर्थिक संकट और मौसम की मार झेल रहे हैं। यह पंक्ति बताती है कि किसी भी समाज की उन्नति का वास्तविक पैमाना उसके सबसे मेहनतकश वर्ग की खुशहाली में निहित है। केवल कागज़ी दावों या धार्मिक आडंबर के बजाय किसानों को उनका अधिकार, सही मूल्य और सम्मान दिलाना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है। स्वामी जी का यह संदेश मानवता और सामाजिक दायित्व की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
स्वामी सहजानंद सरस्वती की चुनी हुई पंक्तियाँ
स्वामी सहजानंद सरस्वती के बारे में
स्वामी सहजानंद सरस्वती (1889–1950) आधुनिक भारत के महान किसान नेता, स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी विचारक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शोषित किसानों के अधिकारों और जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए समर्पित कर दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: स्वामी सहजानंद सरस्वती — लेखक कोश।
ये भी पढ़ें
काव्यमीराबाई: हरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदीहरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदी की लाज राखी, आप बढ़ायो चीर। — मीराबाई19 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यजयप्रकाश नारायण: एक सजग और जागरूक नागरिक ही लोकतंत्रएक सजग और जागरूक नागरिक ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होता है। — जयप्रकाश नारायण4 Oct 2026 पढ़ें →
काव्यसावित्रीबाई फुले: कठिनाइयां और सामाजिक विरोध इंसान के हौसलेकठिनाइयां और सामाजिक विरोध इंसान के हौसले को और अधिक मजबूत बनाते हैं, रुकना कभी भी विकल्प नहीं होता। — सावित्रीबाई फुले21 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यमहादेवी वर्मा: कला और साहित्य का उद्देश्य मानवकला और साहित्य का उद्देश्य मानव मन को परिष्कृत करना है। — महादेवी वर्मा12 Sep 2026 पढ़ें →