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19 Sep 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
मीराबाई: हरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदी
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

हरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदी

की लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।

— मीराबाई

मीराबाई की यह अमर पंक्ति उनकी अगाध भक्ति और भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाती है। इस पद के माध्यम से मीरा भगवान से अपने भक्तों के सभी दुखों और संकटों को दूर करने की विनती करती हैं। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वे पौराणिक प्रसंग का स्मरण करती हैं और कहती हैं कि हे प्रभु! जिस प्रकार आपने भरी सभा में चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई थी, उसी प्रकार आप अपने अन्य भक्तों के संकट भी हरते हैं। यहाँ मीराबाई का विद्रोही और निडर मिजाज झलकता है, जो सामाजिक बंधनों की परवाह किए बिना खुले तौर पर अपने इष्ट से न्याय और करुणा की गुहार लगाती हैं। उनका यह काव्यात्मक अंदाज़ पीड़ा से उपजी गहरी आकुलता और ईश्वर में अटूट विश्वास का अनूठा संगम है।

आज के आधुनिक और संवेदनहीन दौर में भी यह पंक्ति उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सोलहवीं शताब्दी में थी। आज समाज में अन्याय, असुरक्षा, शोषण और अत्याचार के रूप भले ही बदल गए हों, लेकिन प्रताड़ित मनुष्य की पीर वैसी ही बनी हुई है। जब-जब कमजोर और असहाय व्यक्ति खुद को अकेला पाता है, तब-तब यह पंक्ति उसे यह भरोसा दिलाती है कि संकट के समय कोई न कोई शक्ति उसकी रक्षा के लिए अवश्य आएगी। यह रचना हमें यह भी सिखाती है कि अन्याय के आगे झुकने के बजाय अपनी पीर को ईश्वर या न्याय के समक्ष पूरी मुखरता से रखना चाहिए। आज के संदर्भ में यह शोषितों के हक में उठने वाली एक ऐसी मानवीय आवाज है जो अन्याय के खिलाफ लड़ने की आत्मिक शक्ति देती है।

मीराबाई की चुनी हुई पंक्तियाँ

सावन मास मनभावन आयो, सावन की उमंग मेरो मन सजनी
उमड़ घुमड़ चौदिश ते आयो, दामिनी दमके झर लागी रे
म्हारा जीवन धन गोपाल
चरण कमल पर वारूँ तन मन, और कुनकुन की माल
साधु संगति बिन हरिकथा, जीवन निष्फल जात रे।
संत समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय, जो बिन मांगे मिल जाए, पुन्य पुराणन होय।
छाड़ि दई कुल की कान, करि का करिहै मेरो
संतन ढिंग बैठि-बैठि लोक लाज खोई
विष का प्याला राणा भेजा, मीरा पीवत हाँसी
अमोलक हरि नाम सुमिरि के, जग में अमर कहाँसी
जोगिया से प्रीत लगाई, अब काहे का डरना री।

मीराबाई के बारे में

मीराबाई सोलहवीं शताब्दी की एक महान कृष्ण-भक्त कवयित्री थीं। उनका जन्म मेड़ता के कुड़की गाँव में हुआ था और उनकी भक्ति मुख्य रूप से माधुरी भाव की थी। उनके पद आज भी उत्तर भारत में बड़े प्रेम से गाए जाते हैं। पूरा परिचय और सभी विचार: मीराबाई — लेखक कोश

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लेखकawaraalfaz

वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 19 September 2026 · अपडेट: 19 September 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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