
रहमान वे नर मरि चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनसे पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहि॥
— रहीम
रहीम का यह प्रसिद्ध दोहा स्वाभिमान और उदारता के गहरे संबंध को दर्शाता है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी के आगे हाथ फैलाने जाता है, वह आत्मसम्मान खोकर मृत समान
रहीम की चुनी हुई पंक्तियाँ
समय पाय फल होत है, समय पाय तरु पोर
निरंतर फल चाहत है, समय कौन को जोर
निरंतर फल चाहत है, समय कौन को जोर
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
धिन धिन प्रेम प्रवीन को, जो समझे मन की बात। रहिमन ऐसे प्रेम पै, तन मन सब कुबरात॥
तरु फल नहिं खात है सरवर पियत न पान
कहै रहीम परकाज हित, संपत्ति संचहि सुजान
कहै रहीम परकाज हित, संपत्ति संचहि सुजान
कहै रहीम संपति सगै, बनत बहुत बहु रीत
विपत्ति कसौटी जे कसे, सोई साची मीत
विपत्ति कसौटी जे कसे, सोई साची मीत
वे गरीब नेवाज हैं, जो दीन्हों सब त्याग। रहिमन ऐसी रीति तैं, होत परम बैराग॥
काज परे कछु और है, काज सरै कछु और। रहीमन भौंरी के भये, नदी सिरावै मौर॥
रहीम के बारे में
रहीम (अब्दुल रहीम खान-ए-खाना) मध्यकालीन हिंदी साहित्य के महान कवि, नीतिार और सेनापति थे। वे अकबर और जहाँगीर के दरबार में प्रतिष्ठित थे और उनका काव्य मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत है। पूरा परिचय और सभी विचार: रहीम — लेखक कोश।
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