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16 Oct 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
फिराक़ गोरखपुरी: बस यादों के निशान बाकी रह जाते हैं।
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

बस यादों के निशान बाकी रह जाते हैं।

— फिराक़ गोरखपुरी

उर्दू शायरी के महान हस्ताक्षर फिराक़ गोरखपुरी की यह पंक्ति समय के अविरल प्रवाह और इंसानी जज़्बातों की नश्वरता को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि वक्त बीत जाने और स्थित

फिराक़ गोरखपुरी की चुनी हुई पंक्तियाँ

ज़माने की ठोकरों ने हमें यह सिखा दिया
हर इक शख्स यहाँ अपनों की तलाश में है
यूँही आसानी से कोई मुकाम नहीं मिलता।
ठोकरें खाने से ही मिलती है असल में अक्ल
वक़्त के साथ बदल जाते हैं चेहरों के रंग
तन्हाई भी एक खूबसूरत महफिल बन जाती है
जब यादों का कारवां साथ चलने लगता है।
बुलन्दियों का हमेशा यह हाल होता है

फिराक़ गोरखपुरी के बारे में

फिराक़ गोरखपुरी (मूल नाम: रघुपति सहाय 'फिराक़') आधुनिक उर्दू शायरी के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रगतिशील हस्ताक्षर थे। उनकी शायरी में भारतीय सौंदर्यबोध, शास्त्रीयता और रूमानी अंदाज़ का अनूठा संगम देखने को मिलता है। उन्हें उनकी कृति 'गुल्लक-ए-नगमा' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पूरा परिचय और सभी विचार: फिराक़ गोरखपुरी — लेखक कोश।

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लेखकawaraalfaz

वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 16 October 2026 · अपडेट: 16 October 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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