
यार बिना सब जग सूना, दिल का दर्द न जाने दूना।
— अमीर ख़ुसरो
अमीर ख़ुसरो की यह पंक्ति मनुष्य के भीतर के अकेलेपन और सच्चे प्रेम की पीड़ा को बेहद सीधे और प्रभावशाली शब्दों में बयान करती है। इसका अर्थ है कि प्रिय या सच्चे साथी के बिना यह पूरी दुनिया सूनी और वीरान सी लगती है, और दिल का दर्द ऐसा है जो किसी अपने के न होने पर दोगुना बढ़ जाता है। इस पंक्ति में एक सूफी संत जैसी तड़प और एक प्रेमी का सीधापन झलकता है। अमीर ख़ुसरो का मिजाज ऐसा था कि वे राजदरबार की ठाठ-बाट में रहकर भी फकीराना अंदाज रखते थे; उनके यहाँ ईश्वर या अपने गुरु के प्रति प्रेम ही सर्वोपरि था। उनकी शायरी में लोकजीवन की सरलता और गहरे आध्यात्मिक भाव का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो पाठक के दिल को सीधे छू लेता है।
आज के आधुनिक और यंत्रवत जीवन में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज भले ही हमारे पास सोशल मीडिया और तकनीक के जरिए दुनिया भर के लोगों से जुड़ने के साधन हों, लेकिन अपनों से भावनात्मक जुड़ाव कम होने के कारण इंसान के भीतर का अकेलापन बढ़ गया है। भीड़भाड़ के बीच भी दिल का सूनापन और अपनों की कमी का अहसास आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है। ख़ुसरो का यह शेर हमें याद दिलाता है कि जीवन की भौतिक सफलताएँ और सुख-सुविधाएँ तब तक अर्थहीन हैं जब तक हमारे पास सुख-दुःख बांटने के लिए कोई अपना न हो। यह पंक्ति हमें बाहरी दुनिया की दौड़ से निकालकर अपने भीतर झांकने और सच्चे मानवीय रिश्तों को सहेजने की प्रेरणा देती है।
अमीर ख़ुसरो की चुनी हुई पंक्तियाँ
तन मेरो मन पिय भये, दोऊ एक ही रंग
चल ख़ुसरो घर आपने, सांझ भई चहुं देस
उसकी बिगड़ी बात को संवारे करतार
अमीर ख़ुसरो के बारे में
अमीर ख़ुसरो (1253–1325) दिल्ली सल्तनत के काल में एक प्रमुख सूफी संत, कवि और संगीतकार थे। उन्हें 'तूतिया-ए-हिन्द' (भारत का तोता) कहा जाता है और वे खड़ी बोली के प्रथम कवि माने जाते हैं। पूरा परिचय और सभी विचार: अमीर ख़ुसरो — लेखक कोश।
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