
अन्याय सहना और अन्याय करने वाले का साथ देना
दोनों ही समाज के लिए सबसे बड़े पाप हैं।
— डॉ. भीमराव अंबेडकर
भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर का यह विचार समाज में व्याप्त मौन और निष्क्रियता पर तीखा प्रहार करता है। यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि अन्याय के खिलाफ आवाज न उठाना और अत्याचारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से साथ देना, दोनों ही समाज को पतन की ओर धकेलते हैं। बाबासाहेब का मिजाज एक क्रांतिकारी चिंतक और समाज सुधारक का था, जो शोषितों को उनके अधिकारों के प्रति जगाना चाहते थे। वे मानते थे कि कायरता और तटस्थता असल में शोषक को और अधिक क्रूर बनने का हौसला देती हैं।
आज के दौर में यह कथन और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। जब लोग अपने निजी स्वार्थ या भय के कारण सामाजिक बुराइयों और शोषण पर आंखें मूंद लेते हैं, तब यह पंक्ति हमें हमारे नागरिक कर्तव्यों की याद दिलाती है। एक स्वस्थ और समतावादी समाज के निर्माण के लिए केवल खुद को निर्दोष रखना काफी नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने का नैतिक साहस दिखाना भी बेहद जरूरी है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की चुनी हुई पंक्तियाँ
डॉ. भीमराव अंबेडकर के बारे में
डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891–1956) भारतीय संविधान के निर्माता, महान समाज सुधारक और न्यायविद् थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों, शोषितों और महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष और देश के नवनिर्माण में समर्पित कर दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: डॉ. भीमराव अंबेडकर — लेखक कोश।
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