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15 Sep 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
जयशंकर प्रसाद: मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, पर
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, पराजय को

स्वीकार कर लेना सबसे बड़ा और घातक अपराध होता है।

— जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद जी की यह ओजस्वी पंक्ति मनुष्य की अदम्य जिजीविषा और अपराजित पराक्रम की घोषणा करती है। यह कथन स्पष्ट करता है कि मानव का भाग्य पहले से तय नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्म, पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प से अपने भविष्य की रूपरेखा खुद तैयार करता है। जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियाँ या असफलताएँ अंतिम सत्य नहीं होतीं, बल्कि बिना संघर्ष किए हार मान लेना और पराजय को सहजता से स्वीकार कर लेना ही सबसे बड़ा और घातक अपराध है। प्रसाद जी का समग्र साहित्य निराशा और पलायनवाद के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है, जहाँ उनके पात्र कठिनाइयों से घुटने टेकने के बजाय उनसे टकराना बेहतर समझते हैं। छायावादी युग के इस महाकवि का मिजाज मूलतः आशावादी, स्वाभिमानी और राष्ट्र-चेतना से ओत-प्रोत था, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगाने का प्रयास करता है।

आज के इस आधुनिक और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दौर में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आज जब युवा छोटी-छोटी असफलताओं से निराश होकर मानसिक तनाव या पलायन का शिकार हो जाते हैं, तब प्रसाद जी का यह विचार उन्हें आत्मबल और संबल प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि करियर, रिश्तों या जीवन के किसी भी मोर्चे पर मिलने वाली असफलता से डरने के बजाय अपनी कमियों को सुधारते हुए फिर से प्रयास करना चाहिए। यह कथन हमें याद दिलाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी प्रतिकूल हों, यदि मनुष्य के भीतर लड़ने की इच्छाशक्ति जीवित है, तो वह हर मुश्किल को पार कर सकता है। हार को जीवन की अंतिम इबारत मान लेना मनुष्य की अपनी ऊर्जा का अपमान है, और यही संदेश आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा जीवन-मंत्र है।

जयशंकर प्रसाद की चुनी हुई पंक्तियाँ

समय नदी की धारा है, इसमें जो बह गया सो बह गया, इसका एक-एक पल मनुष्य के भाग्य का निर्माता होता है।
अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन है, अपने को ही सहलाते रहना व्यर्थ कर देना है।
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब-जब समाज में अन्याय बढ़ा है, तब-तब क्रांति का वीणापाणि स्वर गूंजा है।
प्रेम और करुणा का ही दूसरा नाम मनुष्यता है, जो इसके बिना है वह केवल पाषाण है।
ममता का आंचल केवल माता के पास ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के हृदय में होना चाहिए।
समरस थे जड़ और चेतन सुंदर भव को था सर्जन, आहत था जीवों का क्रंदन, हुई सुंदर अगाध सुसंवेदन।
हम संस्कृति के उस आकाश के तारे हैं, जो अंधकार में भी अपनी रोशनी बिखेरना नहीं भूलते।

जयशंकर प्रसाद के बारे में

जयशंकर प्रसाद (1889–1937) आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने अपनी कविताओं, नाटकों और कथाओं में भारतीय संस्कृति और मानवीय भावनाओं का अनूठा चित्रण किया। पूरा परिचय और सभी विचार: जयशंकर प्रसाद — लेखक कोश

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वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 15 September 2026 · अपडेट: 15 September 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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