
जो रोशनी थी मिरे घर के आस-पास न थी
— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह पंक्ति वंचना और सामाजिक विषमता की एक गहरी अभिव्यक्ति है। इसका सरल अर्थ है कि दुनिया में उम्मीद, न्याय और ख़ुशी की रोशनी तो मौजूद थी, लेकिन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की चुनी हुई पंक्तियाँ
निगाह-ए-यार जिसे आशना-ए-राज़ करे
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है अपना
वो तिरा ख़्याल था जो दिल के पास आ गया
कब तलक आस रखें दर-ओ-दीवार से हम
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा
حیات ذوقِ سفر کے سوا کچھ اور نہیں
حیات ذوقِ سفر کے سوا کچھ اور نہیں
यही है रीत ज़माने की ऐ मिरे ग़म-ख्वार
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बारे में
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ बीसवीं सदी के सबसे महान उर्दू शायरों में से एक थे। उनकी शायरी में इश्क़ और इंकलाब का अनूठा संगम देखने को मिलता है। वे प्रगतिशील लेखक संघ से गहराई से जुड़े रहे और उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पूरा परिचय और सभी विचार: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ — लेखक कोश।
ये भी पढ़ें
काव्यजयशंकर प्रसाद: मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, परमनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, पराजय को स्वीकार कर लेना सबसे बड़ा और घातक अपराध होता है। — जयशंकर प्रसाद15 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यहरिवंश राय बच्चन: दोनों हाथ जिसे दिखलाते हैं सूनापन, वेदोनों हाथ जिसे दिखलाते हैं सूनापन, वे दोनों हाथ समर्पित हैं तुझको हे जीवन! — हरिवंश राय बच्चन12 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यविलियम शेक्सपीयर: हम जानते हैं कि हम क्या हैं, लेकिन यहहम जानते हैं कि हम क्या हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं। — विलियम शेक्सपीयर13 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यमिर्ज़ा ग़ालिब: ग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो ‘ग़ालिब’ तो कग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो 'ग़ालिब' तो कह डालूँ कि हर इक शे'र में मेरे लहू का एक क़तरा है…12 Sep 2026 पढ़ें →