
उलगुलान! जब तक हमारी रगों में रक्त बह रहा है, अपनी पवित्र
मातृभूमि पर किसी का कब्जा स्वीकार नहीं करेंगे।
— बिरसा मुंडा
भगवान बिरसा मुंडा की यह ऐतिहासिक हुंकार भारतीय स्वाधीनता संग्राम और आदिवासी अस्मिता का सबसे प्रखर दस्तावेज है। “उलगुलान” शब्द केवल एक विद्रोह नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और विदेशी सत्ता के विरुद्ध जन-आन्दोलन की वह चेतना है जो दबे-कुचलों की आवाज बनती है। यह पंक्ति सीधे तौर पर यह उद्घोष करती है कि अपनी मातृभूमि, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देना ही मनुष्य का परम धर्म है। इसमें निहित स्वाभिमान और क्रांति का भाव उस अमर नायक के अदम्य साहस को दर्शाता है जो अपनी मिट्टी से अगाध प्रेम करते थे और अन्याय के सामने सिर झुकाने की बजाय मृत्यु को गले लगाना बेहतर समझते थे।
आज के आधुनिक संदर्भ में, जब जल, जंगल और जमीन पर आधिपत्य को लेकर आदिवासियों और मूलवासियों का संघर्ष लगातार जारी है, बिरसा मुंडा की यह वाणी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर संस्कृति और प्रकृति का विनाश स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह आज के प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है, साथ ही यह संदेश देती है कि अपनी पहचान और मातृभूमि की रक्षा के लिए वैचारिक और सामाजिक उलगुलान आज भी उतना ही जरूरी है जितना औपनिवेशिक काल में था।
बिरसा मुंडा की चुनी हुई पंक्तियाँ
बिरसा मुंडा के बारे में
भगवान बिरसा मुंडा (1875–1900) भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और महान आदिवासी नायक थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन और महाजनों के खिलाफ 'उल्गुलान' (विद्रोह) का नेतृत्व किया। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। पूरा परिचय और सभी विचार: बिरसा मुंडा — लेखक कोश।
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