
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोनही मिलत सुहागा।
— संत रविदास
संत रविदास जी की यह प्रसिद्ध पंक्ति भक्त और भगवान के अद्वैत संबंध को अत्यंत सरल और सुंदर रूप में परिभाषित करती है। कवि कहते हैं कि हे प्रभु! यदि आप बहुमूल्य मोती हैं, तो मैं उस मोती में पिरोया जाने वाला धागा हूँ; और जैसे सोने को शुद्ध करने के लिए सुहागा मिलाया जाता है, वैसे ही आपकी संगति पाकर मेरा जीवन भी पवित्र हो जाता है। रविदास जी का मिजाज पूरी तरह से सहज, विनम्र और आत्मसमर्पण से भरा हुआ है। वे किसी बाहरी आडंबर या कर्मकांड में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि उनका काव्य हृदय की सच्ची निष्ठा, प्रेम और आंतरिक शुद्धि की वकालत करता है। उनकी वाणी में सामाजिक समरसता और समानता का जो स्वर गूंजता है, वह उनके विद्रोही किंतु शांत स्वभाव का परिचायक है, जो अहंकार को मिटाकर प्रेम को सर्वोच्च स्थान देता है।
आज के आधुनिक और आपाधापी से भरे संदर्भ में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आज मनुष्य भौतिकता और स्वार्थ के धागे में उलझकर अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है, ऐसे में यह पद हमें अपने मूल स्रोत से जुड़ने की प्रेरणा देता है। “मोती और धागा” का यह बंधन सिखाता है कि जीवन में सामंजस्य और जुड़ाव कितना आवश्यक है। जैसे सुहागा सोने की चमक बढ़ाता है, वैसे ही आज के दौर में सकारात्मक विचार और मानवीय मूल्य हमारे जीवन को सार्थकता प्रदान कर सकते हैं। यह पंक्ति हमें यह याद दिलाती है कि हम सब किसी एक ही सूत्र में बंधे हैं, जो हमें जाति, वर्ग और धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर मानवता के धागे में पिरोए रखने का संदेश देता है।
संत रविदास की चुनी हुई पंक्तियाँ
संत रविदास के बारे में
संत रविदास (रैदास) भक्तन काल के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका जन्म काशी में हुआ था और वे रामानंद के शिष्यों में गिने जाते हैं। उनकी वाणियों में समतामूलक समाज और सच्चे भक्ति भाव का संदेश मिलता है। पूरा परिचय और सभी विचार: संत रविदास — लेखक कोश।
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