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2 Oct 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
स्वामी दयानंद सरस्वती: ईश्वर सर्वव्यापक, निराकार और न्यायकारी है।
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

ईश्वर सर्वव्यापक, निराकार और न्यायकारी है।

— स्वामी दयानंद सरस्वती

स्वामी दयानंद सरस्वती की यह पंक्ति ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को उजागर करती है। इसका सीधा अर्थ है कि परमात्मा किसी एक स्थान या मूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड में समाया हुआ है, उसका

स्वामी दयानंद सरस्वती की चुनी हुई पंक्तियाँ

सब काम धर्मानुसार, यानी सत्य और असत्य को विचार कर करने चाहिए।
ज्ञान का प्रकाश फैलते ही समाज में फैली अज्ञानता की धुंध अपने आप छंट जाती है।
अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
मनुष्य का विवेक ही उसका सबसे बड़ा मार्गदर्शक है, जो उचित और अनुचित समझाता है।
संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, यानी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
स्त्री शिक्षा के बिना समाज का उत्थान असंभव है।
वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।

स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में

स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) आधुनिक भारत के महान समाज सुधारक, विचारक और आर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को सर्वोपरि मानते हुए भारतीय समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों का कड़ा विरोध किया। पूरा परिचय और सभी विचार: स्वामी दयानंद सरस्वती — लेखक कोश।

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वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 2 October 2026 · अपडेट: 2 October 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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