
संस्कृति हमारी पहचान है, एकता ही हमारी
शान है, इस पर हमें पूरा अभिमान है।
— मैथिलीशरण गुप्त
Let’s adjust to hit the 120-160 word range precisely.
*Draft 1 combined:*
विज्ञापन · Advertisement
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्ति भारत की मूल आत्मा को
मैथिलीशरण गुप्त की चुनी हुई पंक्तियाँ
अब भी बह रहा है उत्तराधिकार में वही रक्त, है वही देश, वही राज्य, वही है भक्त।
समाज में न्याय मिले सबको, यह सबसे बड़ा धर्म है, अन्याय सहना और करना दोनों ही महाकर्म-धर्म है।
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का मर्म होना चाहिए।
जिसकी बूँदों से सींचा गया यह वतन, वही है हमारी माटी का पावन चन्दन।
छोड़ो कल की बातें, कल का इतिहास पुराना, नए दौर में लिखो मिलकर नया जमाना।
प्रेम वह पवित्र बंधन है जो दिलों को जोड़ता है, वैर-भाव और नफरत का हर अंधकार तोड़ता है।
अब तो उठो, जागो, देश की पुकार सुनो, अपनी मातृभूमि के लिए कुछ महान करो।
मैथिलीशरण गुप्त के बारे में
मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) आधुनिक हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रमुख और राष्ट्रकवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक सुधार का संदेश दिया। उनकी रचना 'भारत-भारती' ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशवासियों में देशभक्ति की अलख जगाई थी। पूरा परिचय और सभी विचार: मैथिलीशरण गुप्त — लेखक कोश।
ये भी पढ़ें
काव्यमीराबाई: हरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदीहरी तुम हरो जन की पीर, द्रौपदी की लाज राखी, आप बढ़ायो चीर। — मीराबाई19 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यअल्लामा इक़बाल: न पूछ इन मदरसा-वालों से मक़्सूद-ए-सबक़ क्यन पूछ इन मदरसा-वालों से मक़्सूद-ए-सबक़ क्या है, ये बेचारे तो इल्म-ए-बे-हुनर की जुस्तजू में हैं। — अल्लामा इक़बाल18 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यहरिवंश राय बच्चन: दोनों हाथ जिसे दिखलाते हैं सूनापन, वेदोनों हाथ जिसे दिखलाते हैं सूनापन, वे दोनों हाथ समर्पित हैं तुझको हे जीवन! — हरिवंश राय बच्चन12 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यस्वामी रामतीर्थ: प्रकृति के साथ एकरूप हो जाना ही सच्चीप्रकृति के साथ एकरूप हो जाना ही सच्ची साधना और शांति का मार्ग है। — स्वामी रामतीर्थ20 Sep 2026 पढ़ें →