
न पूछ इन मदरसा-वालों से मक़्सूद-ए-सबक़ क्या है,
ये बेचारे तो इल्म-ए-बे-हुनर की जुस्तजू में हैं।
— अल्लामा इक़बाल
अल्लामा इक़बाल की यह प्रसिद्ध पंक्ति पारंपरिक और व्यावहारिक ज्ञान से रहित शिक्षा प्रणाली पर तीखा प्रहार करती है। इस शेर में शायर का मिजाज एक सुधारक और
अल्लामा इक़बाल की चुनी हुई पंक्तियाँ
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी मोहब्बत के इम्तिहाँ और भी हैं।
अपनी ‘खुदी’ को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।
अक्ल की कश्ती में न बैठ, टूट जाएगी, सहारा ले किसी डूबे हुए मल्लाह का।
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीर्घावर पैदा।
मोहब्बत मुझे उन युवाओं से है, जो सितारों पर डालते हैं निगाहें।
गिला क्या है किसी से, जब मुकद्दर ही हो अपना तंग, शिकायत किस पे हो जब अपने हाथों से हो शिकस्त।
ग़म ओ गुस्सा-ए-दौराँ से बचा रख मुझको, अपनी यादत के, अपने दर-ओ-दीवार से रख।
अल्लामा इक़बाल के बारे में
अल्लामा मुहम्मद इकबाल (1877–1938) भारत के महान शायर, दार्शनिक और चिंतक थे। उन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसी प्रसिद्ध रचना दी और 'खुदी' का प्रसिद्ध दार्शनिक सिद्धांत प्रतिपादित किया। पूरा परिचय और सभी विचार: अल्लामा इक़बाल — लेखक कोश।
विज्ञापन · Advertisement
ये भी पढ़ें
काव्यजयशंकर प्रसाद: मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, परमनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, पराजय को स्वीकार कर लेना सबसे बड़ा और घातक अपराध होता है। — जयशंकर प्रसाद15 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यअज्ञेय: जो नहीं हो सका पूर्ण, उसे भी पूर्ण समझो;जो नहीं हो सका पूर्ण, उसे भी पूर्ण समझो; अधूरापन ही तो जीवन का सौंदर्य है। — अज्ञेय18 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यमिर्ज़ा ग़ालिब: ग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो ‘ग़ालिब’ तो कग़ज़ल पढ़ना मिरे बस का जो हो 'ग़ालिब' तो कह डालूँ कि हर इक शे'र में मेरे लहू का एक क़तरा है…12 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यमहादेवी वर्मा: कला और साहित्य का उद्देश्य मानवकला और साहित्य का उद्देश्य मानव मन को परिष्कृत करना है। — महादेवी वर्मा12 Sep 2026 पढ़ें →