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20 Sep 2026 · awaraalfaz · 1 मिनट का पाठ
घाग-भड्डरी: पूस मास जो बादल छावै, समझो बिना बरसात न जा
चित्र: CC BY 4.0 — Vyacheslav Argenberg · Wikimedia Commons

पूस मास जो बादल छावै, समझो बिना बरसात न जावै।

— घाग-भड्डरी

यह पंक्ति लोककवि घाग के मौसम संबंधी सटीक व्यावहारिक अनुभव को दर्शाती है। इसका सरल अर्थ है कि यदि पूस (पौष) के महीने में कड़ाके की ठंड के समय आसमान में बादल छा

घाग-भड्डरी की चुनी हुई पंक्तियाँ

पच्छिम बादर पूरब जाए, समझे बूढ़े कृषक बलाए।
जेठ मास जो तपै न घाम, तो का वर्षा का बानो काम।
उत्तर दिसि ते मेघ जो आवे, बरखा भारी हुइ ले जावे।
जो बरसै हस्त नक्षत्र, धान उपजै जैसे छत्र।
सावन शुक्ला सप्तमी, जो बरसे अदल, तो पल में होय बादल।
पूस मास जो बादर होवै, राजा प्रजा दुहू दुख रोवै।
शुक्र अस्त होय जो कुंवारी, बरखा होय न जानहु भारी।

घाग-भड्डरी के बारे में

घाग और भड्डरी हिंदी क्षेत्र के प्रसिद्ध लोककवि और भविष्यवक्ता थे जो लगभग 1600 ईस्वी के आसपास हुए। इनकी कही गई कृषि और मौसम संबंधी कहावतें आज भी उत्तर भारत के किसानों के बीच मार्गदर्शक मानी जाती हैं। पूरा परिचय और सभी विचार: घाग-भड्डरी — लेखक कोश

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वाह वाह यार की संपादकीय टीम हिंदी में शिक्षा, पैसा-फाइनेंस, बिज़नेस, सरकारी योजनाओं और जीवन से जुड़ी जाँची-परखी जानकारी लिखती है। हर लेख आधिकारिक स्रोतों से मिलाकर और आसान भाषा में तैयार किया जाता है।

प्रकाशित: 20 September 2026 · अपडेट: 20 September 2026 · हमारे बारे में · संपर्क

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