
पूस मास जो बादल छावै, समझो बिना बरसात न जावै।
— घाग-भड्डरी
यह पंक्ति लोककवि घाग के मौसम संबंधी सटीक व्यावहारिक अनुभव को दर्शाती है। इसका सरल अर्थ है कि यदि पूस (पौष) के महीने में कड़ाके की ठंड के समय आसमान में बादल छा
घाग-भड्डरी की चुनी हुई पंक्तियाँ
पच्छिम बादर पूरब जाए, समझे बूढ़े कृषक बलाए।
जेठ मास जो तपै न घाम, तो का वर्षा का बानो काम।
उत्तर दिसि ते मेघ जो आवे, बरखा भारी हुइ ले जावे।
जो बरसै हस्त नक्षत्र, धान उपजै जैसे छत्र।
सावन शुक्ला सप्तमी, जो बरसे अदल, तो पल में होय बादल।
पूस मास जो बादर होवै, राजा प्रजा दुहू दुख रोवै।
शुक्र अस्त होय जो कुंवारी, बरखा होय न जानहु भारी।
घाग-भड्डरी के बारे में
घाग और भड्डरी हिंदी क्षेत्र के प्रसिद्ध लोककवि और भविष्यवक्ता थे जो लगभग 1600 ईस्वी के आसपास हुए। इनकी कही गई कृषि और मौसम संबंधी कहावतें आज भी उत्तर भारत के किसानों के बीच मार्गदर्शक मानी जाती हैं। पूरा परिचय और सभी विचार: घाग-भड्डरी — लेखक कोश।
ये भी पढ़ें
काव्यकेदारनाथ अग्रवाल: सच्चा दोस्त वही है जो विपत्तिसच्चा दोस्त वही है जो विपत्ति के समय अकेला न छोड़े। — केदारनाथ अग्रवाल15 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यस्वामी रामतीर्थ: प्रकृति के साथ एकरूप हो जाना ही सच्चीप्रकृति के साथ एकरूप हो जाना ही सच्ची साधना और शांति का मार्ग है। — स्वामी रामतीर्थ20 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यरामधारी सिंह दिनकर: रे बटकल! जीवन की दो राहोंरे बटकल! जीवन की दो राहों में, कभी न रुकना चाहिए — रामधारी सिंह दिनकर12 Sep 2026 पढ़ें →
काव्यमीर तक़ी मीर: मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसोंमत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं — मीर तक़ी मीर12 Sep 2026 पढ़ें →