
अपनों ने ही दिया है जब ज़ख्म हमको,
गैरों से क्या शिकायत करें भला।
— शकील बदायूंी
शकील बदायूंनी की यह लोकप्रिय पंक्ति गहरे मानवीय और सामाजिक दर्द को बहुत ही सरल शब्दों में बयान करती है। यह पंक्ति कहती है कि जब कोई अपना व्यक्ति ही आपको धोखा दे या ठेस पहुंचाए, तो बाहरी लोगों से किसी भी प्रकार की शिकायत या उम्मीद करना बेकार है। शकील साहब का शायराना मिजाज हमेशा से अपनी नजाकत, सादगी और दिल को छू लेने वाली संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है। उनकी शायरी में प्यार और मोहब्बत के साथ-साथ जिंदगी की कड़वी सच्चाइयां और अपनापन टूटने का दर्द बहुत खूबसूरती से झलकता है। वह कभी भी अपनी बात कहने के लिए भारी-भरकम शब्दों का सहारा नहीं लेते थे, बल्कि उनके अल्फ़ाज़ सीधे दिल पर असर करते थे।
आज के इस आधुनिक और मतलबी दौर में यह पंक्ति और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज चारों ओर स्वार्थ का बोलबाला है, जहां अपने कहे जाने वाले लोग ही पीठ पीछे वार कर जाते हैं और गैरों से तो वैसे भी किसी भलाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। जब कार्यक्षेत्र, परिवार या समाज में अपनों द्वारा ही विश्वास तोड़ा जाता है, तब शकील साहब का यह शेर एक सांत्वना की तरह काम करता है। यह हमें यह सिखाता है कि अपनों के धोखे से जो मानसिक और भावनात्मक पीड़ा मिलती है, उसके आगे बाहरी लोगों की गलतियां बहुत छोटी लगती हैं। यह पंक्ति हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन की वास्तविक निराशा अपनों की बेरुखी से ही आती है।
शकील बदायूंी की चुनी हुई पंक्तियाँ
शकील बदायूंी के बारे में
शकील बदायूंनी (3 अगस्त 1916 – 20 अप्रैल 1970) हिंदी सिनेमा और उर्दू अदब के महान गीतकार थे। उन्होंने अपनी सरल, सहज और असरदार शायरी से गीत-संगीत की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बनाई। उन्हें उनके रूमानी और दार्शनिक गीतों के लिए हमेशा याद किया जाता है। पूरा परिचय और सभी विचार: शकील बदायूंी — लेखक कोश।
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