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Dard Bhari Shayari

75+ दर्द भरी शायरी — Dard Bhari Shayari in Hindi

तन्हाई और गम के अलफ़ाज़। नीचे दी गई हर शायरी को एक क्लिक में कॉपी करके स्टेटस पर लगाइए।

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तन्हाई के सहरा में ये कैसी शाम आई है
कोई आवाज़ देता है न कोई सूरत पराई है
दिल को बहलाने के अब सब बहाने छूट गए
अपनों से क्या गिला करें जब अपने ही रूठ गए
रात की चादर ओढ़ कर हम यूँ सोए हैं आज
जैसे इस वीराने में कोई लूट गया हो ताज
मेरे कमरे की दीवारों से अब पूछो हाल मेरा
हर एक कोने में बिखरा है टूटा हुआ इक ख़्वाब मेरा
दर्द की इस बस्ती में अब कोई मुसाफ़िर नहीं मिलता
अपनी ही तलाश में खुद से ही कोई काफ़िर नहीं मिलता
अश्कों के समंदर में कश्ती डुबो दी मैंने
अपनी ही खुशियों की खुद ही चिता सजा दी मैंने
लोग पूछते हैं क्यों उदास रहते हो हर पल
हमने भी छुपा ली है सीने में अपनी हर एक हलचल
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कोई तो वजह होगी इस बेरुखी की ऐ खुदा
हमने तो कभी किसी का दिल दुखाया न था कभी जुदा
खामोशियों का शोर अब कानों में गूंजता है
हर एक चेहरा यहाँ अपनों में भी अजनबी दीखता है
चाँदनी रात में भी अब अँधेरा सा लगता है
किसी अपने का ही दिया हुआ हर ज़ख्म गहरा सा लगता है
अब किसी के आने की उम्मीद भी बाकी नहीं रही
इस दिल में अब धड़कनों की भी कोई तामीर नहीं रही
बारिश की बूंदों में ढूंढता हूँ अक्स तेरा
कोई नहीं जानता कितना तन्हा है सफर मेरा
वो जो कहते थे कभी कि साथ नहीं छोड़ेंगे
आज वही हर वादा अधूरी रात में तोड़ गए
अश्क पलकों पे सजाए बैठे हैं बरसों से
कोई तो आए जो पूछे हाल इन नजरों से
ये तन्हाई का आलम भी अजीब खेल खेलता है
खुद से ही बिछड़ कर इंसान खुद से ही मिलता है
जख्म इतने गहरे हैं कि सिलावट नहीं होती
अब तो रोने पर भी आँखों में राहत नहीं होती
तेरी यादों के साए में कट रही है ज़िंदगी
जैसे किसी बेगुनाह को मिल गई हो फाँसी
सफ़ेद कागज़ पे काले लफ़्ज़ों से दर्द उतारता हूँ
मैं रोज़ खुद ही अपनी लाश को कंधा देता हूँ
कोई नहीं पूछता अब इस उजड़े हुए चमन का हाल
हवाएँ भी अब हमसे पूछती हैं दर्द-ए-दिल का सवाल
जिस्म में जान बाकी है पर रूह सो चुकी है
लगता है दुनिया से हमारी कहानी खो चुकी है
तन्हाई से डरता था जो शख्स कभी महफ़िल में
आज वही खो गया है खुद अपनी ही मंज़िल में
रात भर जागने का सिला बस इतना मिला
हर तारे से पूछ लिया तेरा ही पता मिला
ज़ख्मों को सीने की आदत सी हो गई है
अब तो तन्हाई ही हमारी इबादत हो गई है
वक्त के साथ सब बदल जाते हैं ये सुना था
अपने ही गैरों से हार जाएंगे ये न कभी बुना था
अब तो आईना भी हमसे नज़रें चुराता है
देखकर हमारी हालत वो भी मुस्कुराता है
ख़ामोशियाँ भी अब मुझसे शिकायत करने लगी हैं
जो दर्द सहते थे कभी, अब वो आहें भरने लगी हैं
तेरी यादों की जलती शमा बुझती ही नहीं
ये वीरान शहर सो गया, पर मेरी आँखें सोती नहीं
कभी हँसते हुए चहरों को देखा तो याद आया
हमने मुस्कुराने की वजह बहुत पहले खो दी थी
हवा के झोंके जब भी दरवाज़ा खटखटाते हैं
लगता है कोई अपना हाल पूछने आया है
टूट कर बिखरने का हुनर कोई हमसे सीखे
हँसते-हँसते आँख से आँसू गिरा देते हैं
महफ़िल में रहकर भी अकेले ही रहे हम हमेशा
जो दिल के करीब थे, वो कभी अपने न हुए
तेरे दिए जख़्मों का अब कोई हिसाब नहीं
जो बीत गया वो लम्हा अब कोई ख़्वाब नहीं
इस खाली मकान में गूँजती है तेरी ही आवाज़
तन्हाई के सिवा कोई अब यहाँ मेरा हमराज़ नहीं
ज़ख़्म इतने गहरे हैं कि मरहम भी डर जाते हैं
हम वो मुसाफ़िर हैं जो राहों में बिखर जाते हैं
उम्मीदों का हर दीया हमने ख़ुद ही बुझा दिया
रास्ते कठिन थे, तो क़दमों को ही रोक लिया
तेरे इंतज़ार की घड़ी अब ख़त्म सी लगती है
ये ज़िंदगी अब किसी अजनबी की दुआ सी लगती है
आईने में देखा तो एक अजनबी नज़र आया
मुस्कान खो चुकी थी, बस दर्द का साया नज़र आया
रातों की ख़ामोशी में तेरा नाम पुकारते हैं
अपनी ही तक़दीर पर बैठ कर रो लेते हैं
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बिछड़ कर तुझसे हमने ये जाना ए सनम
ज़िंदगी सिर्फ सांस लेने का नाम नहीं होती
जो कभी दिल का सुकूँ थे, वो अब गम की वजह हैं
कैसे कहें कि मेरी तन्हाई की क्या वजह हैं
कागज़ पे लिख कर मिटा दिए हमने अपने सारे अरमाँ
अब तो हवाएँ भी पूछती हैं कि किधर गए वो मेहमाँ
रोने की कोई वजह नहीं, मुस्कुराने का कोई सबब नहीं
ये कैसा मक़ाम है ज़िंदगी का, जहाँ कोई अपना नहीं
जब अपने ही मोड़ लेते हैं मुँह आफ़त के वक्त में
तब ग़ैर भी दूर से मुस्कुरा कर तमाशा देखते हैं
बुझ गए चिराग़ सब, अब तो अँधेरा ही सच्चा है
वफ़ा की झूठी उम्मीद से तो ये अकेलापन ही अच्छा है
सीने में एक दर्द फिर से उठ कर बैठ जाता है
जब भी बीते दिनों का कोई पन्ना खुलता है
नाम तो बहुत हैं इस दुनिया में पुकारने के लिए
पर वो आवाज़ ही खो गई जो दिल को छू लेती थी
काँच के टुकड़ों की तरह बिखरे पड़े हैं सारे ख़्वाब
अब किसे समेटें और किस से शिकायत करें
तेरी राहों को तकते-तकते आँखें भी थक गईं
तू न आया मगर मेरी तन्हाई का पैग़ाम आ गया
तन्हाई का साया अब हर पल साथ चलता है
जैसे कोई पुराना हमसफ़र दर्द समझता है
हमने अपनी दास्ताँ इस कमरे की दीवारों को सुना दी
वो भी ख़ामोश हो गईं और रंग उड़ा दिया
कोई पूछता नहीं हमसे कि अब कैसे दिन कटते हैं
पुराने ज़ख़्म सीने में नए तेवर से पलते हैं
शहर की भीड़ में हम यूँ अकेले हो गए जैसे
किसी वीराने में कश्ती से साहिल दूर होता है
आँखें बंद कर लें तो तेरा चेहरा नज़र आए
खुली आँखों से देखें तो ये दुनिया सूनी लगती है
हवा के साथ बहना था कभी मक़्सूद अपना भी
मगर अब पाँव ज़ंजीर-ए-वफ़ा में जकड़े रहते हैं
किताब-ए-दिल के पन्नों पर तुम्हारा नाम लिखा था
ज़माना फेर गया पन्ने, सियाही रो रही है अब
दिए बुझने लगे हैं घर के कोने-कोने में
अंधेरे पाँव पसार कर अब बाहों में भरते हैं
कोई शिकवा नहीं हमको किसी बेदर्द दुनिया से
हमारे अपने हाथों ने ही ये घर वीरान किया है
उदासी की ये चादर हम ने ओढ़ी है मुद्दत से
कोई सूरज भी आए तो हमारी रात नहीं जाती
परिंदे लौट आए अपने घरों को शाम होते ही
हमारा आशियाना जाने किस रस्ते बिछड़ गया
खामोशी चीखती है रात के इस सन्नाटे में
कोई तो सुन ले आकर दिल की ये अनकही बातें
बिछड़ के तुझसे हमने ज़िंदगी को यूँ गुज़ारा है
बिना परवानों के जैसे कोई जलता हुआ तारा है
कभी जो हँस के मिलते थे वो आँखें फेर लेते हैं
मुक़द्दर का लिखा देखो, ये दिन भी देखने आए
समंदर पार करने की तमन्ना थी निगाहों में
मगर काग़ज़ की कश्ती थी, भँवर में डूब ही जानी थी
तुम्हारे बिन ये वीरान मकान डसता है हमको
दर-ओ-दीवार से अब तो पुरानी याद आती है
हवाओं से जो कहते थे कि रुख़ अपना बदल डालें
वो खुद तन्हाई के मौसम में तिनका बन के उड़ते हैं
सुकूँ की तलाश में निकले थे हम इस शहर-ए-ग़म को
हर इक रस्ते पे तन्हाई का पहरा मिला हमको
सुलगती शाम के साये में बैठा सोचता हूँ मैं
भला किस भूल की इतनी बड़ी तकलीफ़ पाई है
किसी के वादों के साये में उम्र काट दी हमने
हक़ीक़त सामने आई तो सारे ख़्वाब बिखरे हैं
लकीरें हाथ की कहती हैं तक़दीर में ग़म है
जिसे चाहा शिद्दत से, वही हमसे जुदा निकला
ये सन्नाटा डराता है हमें इस सूने कमरे में
कोई आवाज़ दे तो दिल को थोड़ा चैन आ जाए
मुक़द्दर के इशारों पर चला करते थे हम जिनके
वही रस्ते बदलते वक़्त ने हमसे छुपा लिए सारे
ज़ख़्म इतने मिले हमको ज़माने की इनायत से
कि अब मरहम की ख़ाहिश भी दिलों से रूठ बैठी है
भुला देना तुम्हें शायद हमारे बस में होता तो
ये दिल सीने में यूँ हर रोज़ घुट घुट के न जीता
बरसती बारिशों में भी ये आँखें नम ही रहती हैं
कोई ऐसी भी आग है जो पानी से बुझती नहीं
हमारे हिस्से में आई है ये तन्हाई की दौलत
ज़माने भर की खुशियाँ तुम मुबारक हो किसी को भी

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दर्द भरी शायरी क्या है?

दर्द भरी शायरी वह शायरी है जो तन्हाई और गम के अलफ़ाज़ लिखी जाती है। इस पेज पर 75+ मौलिक शायरी एक जगह हैं।

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